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मीठी कोयल-तान से
गफूर 'स्नेही' कबूतर उड़ा,होती अज़ान सेउड़कर जा जुड़ा आसमान से।खण्डहर में उसका बसेरा हैदूर रहता डरकर इंसान से।तुमको मालूम है कितने मरेबनते ताजमहल के मचान से?नहीं, मैं अकेला ही अच्छाडरता हूँ भीड़ से, जान-पहचान से।
वैसे तो उनसे कोई न मिलताचपरासी मिला सकता साहबान से।मिसाइल के युग में जंगलीलड़ाई लड़ता तीर-कमान से।'
स्नेही' गाओ मगर शर्त ये हैसच बात हो मीठी कोयल-तान से।