मां तेरी याद में
रेखा भाटिया
मन छटपटाता रहा, रात भर मैं सोचती रही,तेरी याद में मां मन गुनगुनाता रहा,वो बचपन का आंगन,यौवन की दहलीज,कभी भीगा सावन,कभी तपती धूप,चारों ओर शोर-शराबा,हम भाई-बहनों की फौज,मां की गतिवान छमछमाहट, बौखलाहटअव्यवस्थित सेना की एकमात्र सेनापति,बेखबरी से बंधा आधा जूड़ा,तेजी से बदलते भाव ,नव रसों का एक पल में रसपान करती,उसी फुर्ती से कर-कमलों, पद-चरणों को चलाती ,सभी इन्द्रियां उसकी दास,चौकस हिरनी-सी चाल,कभी गागर उठाती, कभी कपड़े सुखाती,तरकारी का टोकनी हाथ में लिए,हमारे भूखे पेट का हाल जान जाती,छज्जे पर खड़ी धूप में राह ताकती पुकार लगाती,सोटे से धो कपड़ों को,हमारी आत्मा को चमकाती,ज्ञान ,विज्ञान,दुनियादारी सारे पाठ हमें पढाती,बीमारी आ घेरे हमें तो चिंता में वो पड़ जाती,दुआएं मांगती,हर मंदिर का द्वार खटखटाती,कोई जीव-जीवाणु क्या उसे न सताता,बिस्तर पकड़ ले ऐसा कभी न हो पाया,किस मिट्टी की बनी हो तुम,श्वेत-श्याम केश तुम्हारे ,जो है दिन-रात हमारे,तुम्हारी झुर्रियों के पीछे छुपा हमारा बचपन ,हमारे यौवन का भार उठाए,झुकी तुम्हारी कमर ,मसालों से सना अकुशलता से सहेजा तुम्हारा दामन,जिसमें छुपी है लाखों खुशियां,खाली पेट हो, दिमाग पर बोझ हो,दिल में कोई झुंझलाहट या टीस,रामबाण औषधि हो तुम,हर क्षण ममता-मंत्र का जाप करती,सदा शक्ति स्वरुप आकृति-सी तुम,कई वसंत बीत गए,तुम्हें देखा नहीं ,तुम्हें छूआ नहीं,पर हर पल महसूस किया,दूरभाष पर बैचैन तुम्हारें स्वरों में तुम्हारी छबि को देखा,बरसों से छज्जे पर खड़ी पथरा गईं होगीं तुम्हारी आंखें,इतना इंतजार न करो मां,हर गुजरते विमान को देख मुझे याद न करो मां,परदेश में बिटिया ब्याह दी,सोचा बहुत खुश रहेगी,आशीर्वाद है तुम्हारा,बहुत खुश हूं, दो बेटियों संग बस गई हूं,सपनों में अतीत के संग तुम्हें बसा लिया है,तुमसे ममता का पाठ पढ़ ,उसे अपना ध्येय बना लिया है ,अहसास तुम्हारा फिर भी है चारों ओर,मां हो कर भी तेरी ममता को तरसूं हर पल,पेट कभी भरा नहीं,भूख कभी मिटी नहीं, इंतजार की धूप में झुलसा है मन ,इसी आस में क्षण-क्षण गुजारती हूं, तवे पर रोटी सेंक परोसेगी जब तू मुझे,लौट आएगा मेरा भी बचपन,मन छटपटाता रहा,रात भर मैं सोचती रही... मां तेरी याद में...