बाजार छा रहा है
-कविता भाटिया
बाजार छा रहादिलोदिमाग परबच्चों के खिलौनों में, दिवाली की जगमगाहट में, आटा, चावल, दाल मेंखाद में, पानी में,कार में, नौकरी में,पूजा, त्योहार औरसिंगार मेंबताता हैटी.वी. विज्ञापनजहाँ पानी नहींबिजली नहींपर ...... नेटवर्क तो हैमूलभूत जरूरतों परलगा दिए गए प्रश्नचिह्नऐसे में बाजार तय करने लगा हैहमारी जरूरतेंआजमाँ की ममतासिमट गई 'जॉनसन एंड जॉनसन' मेंयह एक ऐसा समय हैजहाँ ब्रांडेड शीतल पेय सम्मुखममता हो जाती है तुच्छआज दीदी की प्यार-दुलार भरी कहानियाँ सिमट गईपोगो, निकलोडियन के कार्टून औरवी.सी.डी में,बच्चों के नटखट खेलकंप्यूटर गेम्स मेंहो रहे तब्दील,ऐसे मेंबाजार बनाता है हमेंनिरंतर बौनाऔर बौनापनसिखाता हैनिरंतर 'रिस्क लेना' कहता है हाथ उठा जोर से'
कर लो दुनिया मुट्ठी में'