बसंत की अँगड़ाइयाँ
काव्य-संसार
डॉ. रामकृष्ण सिंगी शीत का तीखापन गया, मधुमय चली बयार मीठी दस्तक दे रहा रंगों का त्योहार लाल टेसुओं से लदी, पलाश की हर डाल प्रकृति के माथे लगी, जैसे लाल गुलाल हवा झूमकर छेड़ती, फागुनिया आलाप फसल खेत की झूमने लगती अपने-आप पुष्प सज्जित तरूलता, आमों के सिर मौर बसंत की अँगड़ाइयाँ, बिखरी चारों और
मोहन के मन-पटल पर, सौ रंग भरे अनंग राधा के मन अनकही, अकुलाहट व उमंग गत वर्षों के भुलाकर, शिकवे और मलाल नई इबारत रिश्तों की, लिख दें रंग-गुलाल। द्वेष, मनो-मालिन्य, भ्रम हो होली में भस्म तभी सार्थक पर्व यह, वरना वार्षिक रस्म।