....बस हो गया प्यार?
फाल्गुनी
कैसे उग आए कांटे तुम्हारी उस जुबान पर जिस पर थमा रहता था मेरे नाम का मधुर शहद, ठंडे झरने की तरह मेरे गुस्से परझर-झर बरसने वाले तुम, कैसे हो गए अचानक तड़ातड़ पड़ते अंधड़ थपेड़े की तरह, रिश्तों के रेगिस्तान में मैंने तुमसे पाई कितनी सुखद मीठी छांव, और तुमने तपती गर्म रेत-से शब्दों सेकैसे छलनी कर देने वाले किए वार, बार-बार, हर बार ....
बस हो गया प्यार?