बस, एक शब्द बूँद!
फाल्गुनी
कभी तो झरो मुझ पर एक ऐसी शब्द-बूँद कि मेरी मन-धरा पर प्रस्फुटित हो जाए शर्माया हुआ प्यार का कोमल अंकुरसिर्फ तुम्हारे लिए। कभी तो रचों मेरे इर्द गिर्द शब्द-फूलों का रंगीन समाँ कि मैं महकने लगूँ और भर जाऊँ खुशियों की गंध से सिर्फ तुम्हारे लिए।
कभी तो आने दो मेरे कजरारे बालों तक नशीली शब्द-बयार का झोंका कि मेरे पोर-पोर में खिल उठें ताजातरीन कलियाँ सिर्फ तुम्हारे लिए। कभी तो पहनाओं अपनी भावनाओं को ऐसे शब्द-परिधान कि जिन्हें देखकर लहरा उठें मेरे भीतर का भीगा सावन सिर्फ तुम्हारे लिए। मत बरसाओं मुझ पर ऐसी शब्द-किरचें कि होकर लहूलुहान मैं, बस रिसते जख्म ही ला सकूँ तुम्हारे लिए!
लेखक के बारे में
स्मृति आदित्य