Poem | बनजारे हैं पहाड़ के बादल
काव्य-संसार
सुदर्शन वशिष्ठ
बनजारे हैं पहाड़ के बादल
पहनाते हैं पहाड़ पेड़-पौधों को बंगें
एकदम ढाल लेते
चोटी ढलान खेत खलिहान के आकार।
बंगें, जो निशानियाँ हैं सौभाग्य की
सुहाग की
बादल की ये बंगें
टूटें न कभी
पहाड़ से बादल
रूठें न कभी।
ND
पहनाते हैं पहाड़ पेड़-पौधों को बंगें
एकदम ढाल लेते
चोटी ढलान खेत खलिहान के आकार।
बंगें, जो निशानियाँ हैं सौभाग्य की
सुहाग की
बादल की ये बंगें
टूटें न कभी
पहाड़ से बादल
रूठें न कभी।
