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पीले पड़ गए उन पन्नों पर
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आकांक्षा पारे पीले पड़ गए उन पन्नों परसब लिखा है बिल्कुल वैसा ही। काग़ज की सलवटों के बीचबस मिट गए कुछ शब्दमगरउन अस्पष्ट अक्षरों कोपढ़ सकती हूँ बिना रुके आज भीबित्ते भर की चिंदी मेंसमाई हुई हूँ मैं। अनपढ़ लिखावट सेलिखी गई हैएक अल्हड़ प्रणय गाथाउसमें मौजूद हैसाझे सपने, साझा भय,झूले से भी लंबी प्रेम की पींगेंमौजूद है उसमेंमुट्ठी में दबे होने का गर्म अहसासक्षण भरी को खुली हथेली की ताज़ा साँसफिर पसीजती हथेलियों में कैद होने की गुनगुनाहटअर्से से पर्ची ने देखी नहीं धूपन वह ले पाई है चैन की नींदकभी डायरी तो कभी संदूकची में छुपती रहती हैयहाँ-वहाँ ताकि कोई देख न लेऔर जान न जाएचिर-स्वयंवरा होने का राज़। साभार : वागर्थ