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Written By WD

दिल के दरवाजे पर दस्तक

दिल
विजय कुमार सप्पाती
NDND
कल रात दिल के दरवाजे पर दस्तक हुई,

जिन्दगी की आँखों से देखा तो

तुम थीं।

मुझसे मेरी नज्में माँग रही थीं,

उन नज्मों को जिन्हें संभाल रखा था,

मैंने तुम्हारे लिए,

एक उम्रभर के लिए,

आज कहीं खो गई थीं,

वक्त के धूलभरे रास्तों में,

शायद उन्हीं रास्तों में,

जिन पर चलकर,

NDND
तुम यहाँ आई हो,

क्या किसी ने तुम्हें बताया नहीं कि

परायों के घर,

भीगी आँखों से नहीं जाते।
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