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दिल के दरवाजे पर दस्तक
विजय कुमार सप्पाती कल रात दिल के दरवाजे पर दस्तक हुई, जिन्दगी की आँखों से देखा तो तुम थीं। मुझसे मेरी नज्में माँग रही थीं,उन नज्मों को जिन्हें संभाल रखा था, मैंने तुम्हारे लिए, एक उम्रभर के लिए,आज कहीं खो गई थीं, वक्त के धूलभरे रास्तों में, शायद उन्हीं रास्तों में, जिन पर चलकर,
तुम यहाँ आई हो,क्या किसी ने तुम्हें बताया नहीं कि परायों के घर, भीगी आँखों से नहीं जाते।