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Written By WD

दस्‍तक प्रेम की

ज्योति जैन

कविता
ND
बार-बार देखना
दर्पण,
शायद संकेत हो
यौवन के आगमन का।
वही करती हूं,
जब लगता है
बचपन,
फिसल रहा है
ह‍ाथ से,
रेत की मानिन्‍द।
पर जब,
दर्पण में स्‍वयं की जगह,
पाती हूं
अक्‍स-
किसी और का,
समझ गई मैं,
दस्‍तक है ये
प्रेम के प्रथम
आगमन की।
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WD