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Written By WD

दरख़्त जब अशांत हैं

दरख़्त
त्रिलोक महाव
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दरख़्त जब अशांत हैं

बेजुबान

दरख़्तों की भी तो

होती है जान

चोट लगने पर

रोते हैं

रिसते हैं

उनके भी जख़्‍म

देखा है

किसी ने रोते हुए

सिसकते हुए

वादियों में

सुना है उन्हें

गुनगुनाते हुए

हवा के साथ खिलखिलाते हुए

बेशक करते हैं

प्यार, दरख़्त भी

सावन की घटाओं स

भीगते हैं

पहली फुहार से

झूमते हैं

पहाड़ों की गोद में

दरख़्त जब शांत हैं

तपस्वी हैं

मौनव्रती हैं

गहन साधना में लीन

दरख़्त जब अशांत हैं

तूफान हैं

भयंकर तूफान

दरख़्त दोस्त हैं

आदमी से कहीं बेहत

सब कुछ लुटाकर भी

उफ नहीं करते।
साभार : संबोधन
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