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दरख़्त जब अशांत हैं
त्रिलोक महावर दरख़्त जब अशांत हैंबेजुबानदरख़्तों की भी तोहोती है जानचोट लगने पर रोते हैं रिसते हैं उनके भी जख़्मदेखा हैकिसी ने रोते हुएसिसकते हुएवादियों मेंसुना है उन्हेंगुनगुनाते हुएहवा के साथ खिलखिलाते हुएबेशक करते हैंप्यार, दरख़्त भी सावन की घटाओं से भीगते हैं पहली फुहार सेझूमते हैं पहाड़ों की गोद मेंदरख़्त जब शांत हैंतपस्वी हैंमौनव्रती हैंगहन साधना में लीनदरख़्त जब अशांत हैं तूफान हैं भयंकर तूफानदरख़्त दोस्त हैं आदमी से कहीं बेहतर सब कुछ लुटाकर भीउफ नहीं करते।साभार : संबोधन