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तुम नहीं लौटोगी
फाल्गुनी
जब देखता हूँ मैं तुम्हारे माथे पर चमकती पसीने की बूँदें, ओस झरती हैंमेरे दिल की महकती क्यारी में, जब देखता हूँ मैं तुम्हें गोबर और पीली मिट्टी से घर का आँगन लीपते हुए मेरे मन के आँगन से सौंधी खुशबू उड़ती है, जब बुनती हो तुम ठिठुरती सर्दियों में कोई मफलर मेरे लिए मेरे अंदर का मुस्कुराता प्यार ख्वाब बुनता है तुम्हारे लिए। कभी-कभी सोचता हूँ कि काश, तुम मेरे इन देखे-अनदेखे सपनों की एक झलक भी देख पाती तो शायद यूँ कुँवारा छोड़ मुझेखुद कुँवारी ना रह जाती। आज जब गर्मियों मेंतुम्हारी यादों की कोयल का कंठ बैठे जा रहा है तुम्हारा हाथ अमराई के तले मेरे कान उमेठे जा रहा है। फाल्गुनी, तुम नहीं लौटोगी ये मुझे पता है, पता नहीं क्यों आज खुद को विश्वास दिला रहा हूँ। यह मेरे मन की कविता जाने क्यों आज तुमसे ही लिखवा रहा हूँ।
लेखक के बारे में
स्मृति आदित्य