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Written By WD

डूब चुके हैं बार-बार

देवमणि पांडेय
- देवमणि पांडेय

ND
डूब चुके हैं बार-बार हम इन आँखों के पानी में
नाम तलक न आया मेरा फिर भी किसी कहानी में

जीवन अपना बीत रहा है कुछ यूँ दुख के साए में
जैसे फूल खिला हो कोई काँटों की निगरानी में

छीन लिया दुनिया ने सब कुछ फिर भी मैं आबाद रहा
जब-जब मुझको हँसते देखा लोग पड़े हैरानी में

जिसको देखो ढूँढ रहा है काश ज़िंदगी मिल जाए
जाने कैसी कशिश छुपी है इस पगली दीवानी में

दुनिया जिसको सुबह समझती तुम कहते हो शाम उसे
कुछ सच की गुंजाइश रक्खो अपनी साफ़बयानी में

ख़ुदग़र्ज़ी और चालाकी में डूब गई है ये दुनिया
वरना सारा ज्ञान छुपा है बच्चों की नादानी में।
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WD