डूब गया वह उदास दिन
अनिल जनविजय
उचकी वह पंजों पर थोड़ा-सा
फिर मेरी ओर होंठ बढ़ाए
चूमा उसे मैंने यों, ज्यों मारा कोड़ा-सा
यह अहम हमारा हमें लड़ाए
फिर झरने लगे आँसू वहाँ निरंतर
धुल गए बोझिल से वे पल-छिन
सावन की बारिश में निःस्वर
डूब गया वह उदास दिन ।
साभार : कविता कोश
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फिर मेरी ओर होंठ बढ़ाए
चूमा उसे मैंने यों, ज्यों मारा कोड़ा-सा
यह अहम हमारा हमें लड़ाए
फिर झरने लगे आँसू वहाँ निरंतर
धुल गए बोझिल से वे पल-छिन
सावन की बारिश में निःस्वर
डूब गया वह उदास दिन ।
साभार : कविता कोश
