झर-झर-झर आकाश!
प्रयाग शुक्ल
मेघ झर रहेसब खिड़की-दरवाजेजैसे बजते बाजेदौड़ा जाता जलझर-झर-झर कलकलक्या छूटा क्या साथ। हवा। हिले कुछ तारबनते मिटते से,ये कितने आकारबूँदें छू दें आएँ चादर-सी लहराएँ पलकों में जो बंद,खोलें, फिर पा जाएँ सब कुछ इतने पासझर-झर-झर आकाश।