जैसा चाहती हो तुम
पाब्लो नेरूदा की प्रेम कविता
अहा! चीड़ों का विस्तार, सरसराहट टूटती लहरों की,रोशनियों का धीमा खेल, अकेली घंटीसांझ की झिलमिल गिरती है तुम्हारी आंखों में, गुड़िया,और भूपटल पर, जिसमें यह धरती गाती है!गाती हैं तुममें नदियां और मेरी आत्मा खो जाती है उनमेंजैसा चाहती हो तुम वैसा भेज देती हो इसे जहां चाहेतुम्हारी उम्मीद के धनुष पर लक्ष्य करता हूं अपनी राहऔर एक उन्माद में छोड़ देता हूं अपने तरकश के सारे तीरहर तरफ से देखता हूं धुंध से ढंका तुम्हारा कटिप्रदेश,तुम्हारी चुप्पी पकड़ लेती है मेरे दु:खी समय को;मेरे चुम्बन लंगर डाल देते हैंऔर घरौंदा बना लेती है मेरी एक विनम्र इच्छातुम्हारे भीतर, स्फटिक पत्थर-सी तुम्हारी पारदर्शी भुजाओं के पासआह! भेद-भरी तुम्हारी आवाज, जो प्रेम करती हैमृत्यु-सूचनाओं के घंट-निनादों से, और उदास हो जाती हैअनुगूंजित मरती हुई शाम में!एक दुर्बोध समय में, इस तरह मैंने देखा खेतों के पार,गेहूं की बालियों को राहदारी करते हुए हवा के मुख में।