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Written By WD

जिस डाली ने फूल बिखेरे

फूल
जमना प्रसाद 'जलेश'
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मन का मीत मिला न कोई
दिल के दुश्मन सभी मिले।

जिस डाली ने फूल बिखेरे
उसको चुभते फूल मिले।

दौलत की दीवाली देखी
देखी भूख किसानों की।

कौवे घर-घर मौज उड़ाएँ
कोयल हुई वीरानों की।

श्रमिकों के हाथों में छाले
श्रमहीनों को फूल मिले।

कैसा न्याय दिया है प्रभुजी
कलम धनी को फाँके।

अक्षरहीन विराजे कुर्सी
खींच रहे हैं खाँके।

संविधान के निर्माता ही
आज नियम प्रतिकूल मिले।

जिस डाली ने फूल बिखेरे
उसको चुभते फूल मिले।
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WD