जब तुम चुप रहती हो
-जितेंद्र दवे
जब तुम चुप रहती होआसमांउदास हो जाता है।बादलों की ओट मेंचांद भीहोता है गुमसुम।तब सुनाई नहीं देतेस्वर बस्ती केहवाएं बंधी लगती हैंखूटें से।तब चुप लगता हैसारा जहानसिवा उस शोर केजो उठता हैदिल के किसी कोने सेकि मैं सुनना चाहता हूंचुप तुम्हारीजब तुम चुप रहती हो।