- रेखा बैजल तड़के ही नन्हा सूरज मेरी खिड़की से झाँककर मेरे छोटे से घर को निहारता हुआ... उसकी मासूम किरणें हर चीज को टटोलती हैं जिन्हें मैं किसी को छूने नहीं देती।
किरणें फर्श पर रेंगती हैं कुछ मेरे बिस्तर पर लोटपोट करती हैं... कुछ किरणें कोने में रखी मूर्ति में अपना चैतन्य भरने की नाकाम कोशिश करती हैं।
कुछ किरणें मेरे शरीर पर आकर गोद में समाने की कोशिश करती हैं, और मैं भी पगलाई सी उन नन्ही किरणों को अपनी बाँहों में भरने की कोशिश करती हूँ।