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कोई शाम सुहानी घिरी चले
सहबा जाफ़री कोई अब्र उड़े, कोई कली खिलेकोई शाम सुहानी घिरी चलेकहीं सावन रुत के खजाने होकहीं चंदा शाने-शाने हो किसी कौस की तिरछी परचम परकोई बादल वारी जाता होकिसी वादी के इक कोने मेंकोई चरवाहा कुछ गाता होकहीं मीठे सुर में कोयल भीकुछ गुनगुन गुनगुन गाती होकोई बदली आकर धीमे सेकुछ पाज़ेबों से टकराती होफिर मेघा आकर धीरे सेसूरज के नैना टँकता होकोई राझाँ जैसे चुपके सेइक हीर को दिल में रखता होसारे रंग ख्यालों कोए काश! कोई तस्वीर मिलेख्वाबों के इस सावन कोइस बार कोई ताबीर मिले।