काश, वो फिर से जुड़ जाएँ
बुद्धिसेन शर्मा की ग़ज़ल
चाँद-सूरज की तरह और न सितारों की तरह,हम हैं रोशन किसी दरिया पे चिराग़ों की तरह।रू-ब-रू उसके कोई राज़ छुपा भी न सकूँ,मैं इबारत की तरह वह खुली आँखों की तरह।चंद अपने हैं जो तकलीफ बहुत देते हैं,खुद निकल जाएँगे हिलते हुए दाँतों की तरह।काश निकले कोई सूरत कि वो फिर से जुड़ जाएँ,गिर के बिखरे हैं जो मिट्टी के खिलौनों की तरह।बात-ही-बात में ये लोग चटख उठते हैं,जंगली आग में जलते हुए बांसों की तरह।अभी आकाश पे जी भर के चमक ले सूरज,रात फिर तुझको बिखर जाना है तारों की तरह।बस यही लगता है हम लूट लिए जाएँगे,जब हमें मिलते हैं कुछ लोग फरिश्तों की तरह।सबकी आँखों को भले लगते हैं हँसते हुए फूल,घर से स्कूल को जाते हुए बच्चों की तरह।कोई तहरीर जो अश्कों से लिखी जाती है,वह अमिट होती है माथे की लकीरों की तरह।अपने साँचे में कोई ढाल रहा है मुझकोव न ख्वाबों की तरह है न ख़यालों की तरह।