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कराह धरती की
काव्य-संसार
कल तक दिखते थे हरे लहलहाते खेत जहाँ अब नजर आने लगे हैं मशीनी दानव वहाँ धरती के सीने पर चलेंगे पहिए बुलडोजर के एक ही दिन में धरती बंजर-वीरान हो जाएगी। फिर शुरू होगा खेल खरीद-फरोख्त का और माँ-सी उपजाऊ धरती बोली की भेंट चढ़ जाएगी,धन्ना सेठ ले आएगा आदमियों की फौज भारी उपजाऊ खेतों को मिटा लम्बी इमारतें तानी जाएँगी घर-बाज़ार-स्कूल-अस्पताल, लोगों की हलचल होगी मगर इन सब में गुम हो जाएगी कराह धरती कीक्या फिर पके दानों की खुशबू हवा को महका पाएगी?क्या फिर बैलों की घंटियाँ कानों में गूँज पाएँगी?शोरगुल में डूबे मन में क्या कभी ये सोच आएगी?शाश्वत प्रकृति को तो नष्ट किया हमने,अब ये नश्वर इमारतें कितना साथ निभाएँगी?