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कराह उठी मानवता
कराह उठी मानवतामौत के इन दंरिदों से बू आती है दगाबाजी की पड़ोसी के इन हथकंडों से।हर बार बढ़ाया दोस्ती का हाथ प्यार नहीं लाशें बनकर आई उपहारबस अब खामोश बैठों देश के सत्ताधारों अब वक्त है कर दो शासन जनता के हवाले। जेहाद का घूँट जिसे पिलाया जाताभाई को भाई का दुश्मन बताया जातावो क्या जाने प्यार की भाषा प्यार निभाना जिसे न आता? मेरा देश जहाँ है शांति और अमनदुश्मन नहीं सबके दोस्त है हम जरा आँखे खोलों ऐ दगाबाज नौजवानोंअपने भटके कदमों को जरा सम्हालों। जानों तुम उन माँओं का दर्दजिसने खोया है अपना लालसेज सजाए बैठी थी दुल्हनपूछे अब पिया का हाल। उन अनाथों के सपने खो गएमाँ-बाप जिनके इन धमाको में खो गएममता लुटाते सगे-संबंधी सारे माँ-बाप की लाशों से लिपटकर रोते ये बेचारे।
आतंक का तांडव मचाकर क्यों माँगता है तू मौत की भीख?ऐ दरिंदे जरा सोच उन लोगों के बारे में जो हो गए अब लाशों में तब्दील। कब्रगाह बने है आज वो स्थान जहाँ बसते थे कभी इंसान काँपती है रूहें अब वहाँ जाने से आती है दुर्गंध अब पड़ोसियों के लिबासों से।