एक पेड़ परिवार
- अशोक सोनी
माता मूल तना पिता, बहिन-बन्धु हैं डार।फूल-पत्तियां गंध हैं, एक पेड़ परिवार॥मां माटी पितु बीज हैं, देख-रेख जलधार।हरा-भरा-सा खेत है, मेरा प्रिय परिवार॥मां चन्दा सूरज पिता, देते चिर उजियार।भाई बरसे मेघ से, बहिन बसंत बयार॥मां नाम से बड़ा नहीं, जग में कोई नाम।उसकी पावन गोद में, खेल रहे हैं श्याम॥मां समान कोई नहीं, है सृष्टि में महान।वो सबको देती सुधा, खुद करनी विषपान॥मां के मन के सामने, लघु दिखता आकाश।उसकी वाणी में मिले, मधु से अधिक मिठास॥मां से पावन है नहीं, जग में कोई नाम।उसके चरणों में बसे, काबा-काशी धाम॥पितुश्री ने परिवार की, रक्खी डोर संभाल।यहां कभी चलता नहीं, कोई टेढ़ी चाल॥बेटा हैं मां-बाप का, संकट मोचन लाल।कभी बने तलवार तो, कभी बने वो ढाल॥बेटी पीहर में रहे या अपने ससुराल।वो ऊंचा रखती सदा, दोनों कुल का भाल॥बहुत बंधी मजबूत है, ये रिश्तों की डोर।दुखते घुटने ज्यों मुड़े, स्वयं पेट की ओर॥