एक और नया गीत
शलभ श्रीराम सिंह
चंपा ने
जब पलाश को देखा
थोड़ी-सी और खिल गई!
एक की हथेली ने पोंछ लिया
दूजे के माथे का पसीना
सहसा आसान हो गया जीना
बिन खोजे राह मिल गई!
चंपा ने
जब पलाश को देखा
थोड़ी-सी और खिल गई!
ईहा की बँधी हुई मुट्ठियाँ
जीवन के उठे हुए पाँव
देख - फ़र्क़ अपना खो बैठे हैं
जाड़ा-बरसात- धूप-छाँव!
कुंठा की नींव हिल गई!
चंपा ने
जब पलाश को देखा
थोड़ी-सी और खिल गई!
साभार : वागर्थ
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चंपा ने
जब पलाश को देखा
थोड़ी-सी और खिल गई!
एक की हथेली ने पोंछ लिया
दूजे के माथे का पसीना
सहसा आसान हो गया जीना
बिन खोजे राह मिल गई!
चंपा ने
जब पलाश को देखा
थोड़ी-सी और खिल गई!
ईहा की बँधी हुई मुट्ठियाँ
जीवन के उठे हुए पाँव
देख - फ़र्क़ अपना खो बैठे हैं
जाड़ा-बरसात- धूप-छाँव!
कुंठा की नींव हिल गई!
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चंपा ने
जब पलाश को देखा
थोड़ी-सी और खिल गई!
साभार : वागर्थ
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