उजले कल के वास्ते
काव्य-संसार
गोविंद कुमार गुंजन कोहरे का आँचल लिए, ऐसे निकली भोर।सब फूल शरमा गए, देख क्षितिज की ओर॥ कैसा होगा साल यह, पंडित पोथी खोल।अपनी आशा को जरा, विश्वासों से तोल॥चाँदी सारी धूप की, धरती ने ली मोल।नदियों ने दर्पण गढ़े, जिनके सच्चे बोल॥सीटी देकर रेल चली, गहरा कोहरा काट।उजले कल के वास्ते, कभी न छोड़े बाट॥कोहरा ढँकी पहाड़ियाँ, झीलें भी चुपचाप।पथ में तुम हो साथ तो, मंजिल आए आप॥ पर्वत से उतरे नदी, बँधी नाव से पाल।संदेशा फिर प्यार का, ले आया यह साल॥धीरज रख चलते रहो, सुबह दोपहर शाम।उसका घर मिल जाएगा, जिसका रटते नाम॥