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आलिंगन हवाओं का
प्रयाग शुक्ल आलिंगन हवाओं का।और ऐसा भी कि गुजर हीन सके हवा बीच उसके!और वह भी किहल्का हो स्पर्श हो बस सरसराहट एकवस्त्रों कीकंधे पर, पीठ पर,हल्की-सी एक थाप कुछ है आलिंगन मेंजो यों दिखता नहींअपने भी पार चला जाता हैलेकिन अदृश्य कुछ, सौम्य मधुरआता उतर भीतर,दो के मिल जाने परवापस आ किन्हींदो दिशाओं से!