आग घर-घर जल रही है
श्रीकांत प्रसाद सिंह
कहाँ आ पहुँचे,
बटोही !
साँप का तो यह शहर है,
कहाँ खोजोगे
बसेरा ?
ब्याल विषघर हर डगर है !
नाग-कन्या
सुंदरी है,
चंचला ! मन-मोहनी है !
प्रणय की
प्रयासी, वियोगिनी
मानिनी ! उन्मादिनी है !
मधु प्रणय की
रागिनी क्या
बीन पर तुम बजा सकते ?
विरह की पीड़ा
सुरों में
ताल-लय पर सजा सकते ?
शरण-स्थल
मिल सकेगा,
छरहरी बावली है !
नवयौवना यह
द्रौपदी-सी श्यामली है!
नाग-कन्या के इशारे
राज-सत्ता चल रही है,
नाग-राजा
है विलासी !
आग घर-घर जल रही है।
साभार : अक्षरा
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कहाँ आ पहुँचे,
बटोही !
साँप का तो यह शहर है,
कहाँ खोजोगे
बसेरा ?
ब्याल विषघर हर डगर है !
नाग-कन्या
सुंदरी है,
चंचला ! मन-मोहनी है !
प्रणय की
प्रयासी, वियोगिनी
मानिनी ! उन्मादिनी है !
मधु प्रणय की
रागिनी क्या
बीन पर तुम बजा सकते ?
विरह की पीड़ा
सुरों में
ताल-लय पर सजा सकते ?
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शरण-स्थल
मिल सकेगा,
छरहरी बावली है !
नवयौवना यह
द्रौपदी-सी श्यामली है!
नाग-कन्या के इशारे
राज-सत्ता चल रही है,
नाग-राजा
है विलासी !
आग घर-घर जल रही है।
साभार : अक्षरा
