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ghazal | आँसू तो बहना है आखिर

ग़ज़ल

ग़ज़ल
- विलास पंडित 'मुसाफ़िर'
ND
दुनिया का हर जुल्म सहना है आखिर
हमें आदमी बन के रहना है आखिर

जो बोलेंगे सच तो बुरे ही बनेंगे
हर बात चुप रह के सहना है आखिर

थे झूठे दिखावे, ये धोखा, दिलासा
हर शख्स जामा ये पहना है आखिर

जिसे आदमी कहते आए हैं हम तुम
बहुत बेशकीमती सा गहना है आखिर

हरेक मोड़ पर ही वो लूटा गया है,
'मुसाफ़िर' के आँसू तो बहना है आखिर।
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WD