poem | अछूत बनाम अछूती
ज्योति जैन
वे निकल जाती है
मुझसे पल्ला बचाकर,
अछूत हूँ ना मैं !
उनकी फैलाई गंदगी को
सफाई में बदलने के बदले
वे नोट भी मेरे पल्ले में डाल देती है,
कहीं छू ना जाए मेरी अँगुलियाँ
उनकी नाजुक अँगुलियों से।
यहाँ तक कि रोटी भी
देती तो है पर...
ऊपर से पटक कर
अछूत हूँ ना मैं !
पर मैं अछूती नहीं हूँ,
बिल्कुल नहीं।
क्योंकि
उनके मर्दों की अँगुलियाँ
रेंगती है मेरे जिस्म पर
बिना जाति भेद के।
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मुझसे पल्ला बचाकर,
अछूत हूँ ना मैं !
उनकी फैलाई गंदगी को
सफाई में बदलने के बदले
वे नोट भी मेरे पल्ले में डाल देती है,
कहीं छू ना जाए मेरी अँगुलियाँ
उनकी नाजुक अँगुलियों से।
यहाँ तक कि रोटी भी
देती तो है पर...
ऊपर से पटक कर
अछूत हूँ ना मैं !
पर मैं अछूती नहीं हूँ,
बिल्कुल नहीं।
क्योंकि
उनके मर्दों की अँगुलियाँ
रेंगती है मेरे जिस्म पर
बिना जाति भेद के।
