क्रांति का जलजला
अरबों की तादाद में 'देश का बड़ा नोट' बलिदान हुआ।
उधर कालाधनपति घर बैठे लहूलुहान हुआ।।
स्वच्छ धनवालों के लिए तो सचमुच नया विहान हुआ।।
वे ही चीखे-चिल्लाए जो अंधेरों में पिट गए।
जिनके खजानों की जोड़ में एक के अंक के बाद के सारे शून्य मिट गए।।1।।
क्रांति जब भी आएगी एक बड़ा जलजला होगा।
ऊंची लहरें उठेंगी, उथल पुथल का सिलसिला होगा।
मिटेंगे रिश्वतखोर, आमजन का तो भला होगा।
आमजन ने तो सचमुच असुविधा को बिना शिकवा वहन किया है।
विरोधियों की चिल्लपों को नकार कर परेशानी को चुपचाप सहन किया है।।2।।
चीखे वे जिनका एक दिन यही हश्र होना था।
जिनके बाथरूमों में गड़ा धन, नोटों की गड्डियों का बिछोना था।।
विलासिता के सरंजामों से सजा घर का हर एक कोना था।
समझदार तो बैठे हैं प्रसन्न सुधारों के सूर्योदय में।
उस सुधारकर्ता की समवेत जयकार करते हुए एक लय में।।3।।
लेखक के बारे में
डॉ. रामकृष्ण सिंगी
डॉ. रामकृष्ण सिंगी ने मध्यप्रदेश के शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालयों में 40 वर्षों तक अध्यापन कार्य किया तथा 25 वर्षों तक वे स्नातकोत्तर वाणिज्य विभागाध्यक्ष व उप प्राचार्य रहे। महू में डॉ. सिंगी का निवास 1194 भगतसिंह मार्ग पर है। डॉ. सिंगी देवी अहिल्या विश्वविद्यालय इंदौर (मप्र) के वाणिज्य संकाय....
और पढ़ें