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कविता : महाराष्ट्र का महा-सर्कस

poem on Maharashtra Politics
ये (नेता) क्या कभी बाज आएंगे 
अपनी शाश्वत घिनौनी फितरत से।  
रोएगा मतदाता ही जिसने चुना इनको,
अच्छे शासन की हसरत से || 1 || 
 
जो लड़ेंगे सरकार बनाने में,
क्या (ख़ाक) सरकार चलाएंगे।  
मनमानी रेवड़ियां बाटेंगे,
हर पद की जुगाड़ लगाएंगे || 2 || 
 
हां, हमने ही तो चुना इनको,
अब सिर धुनकर क्यों पछताएं हम। 
बेबस से उन्हें कोसते हुए,
क्यों अपना खून जलाएं हम || 3 || 
 
ये बेहया, सत्ता लोभी अपनी 
हरकतों से बाज न आने वाले। 
ठगे जाते हैं सदा, ठगे जाते रहेंगे,
हम मतदाता ही भोले-भाले || 4 || 
 
झूठा हो गया प्रजातंत्र,
झूठी सब कवायदें चुनाव की। 
जिसकी पतवारें टूटी हों,
कैसे रक्षा होगी उस नाव की ||5 ||
 
अवसरवादी गठबंधन की राजनीति 
है प्रजातंत्र की दुखती नस। 
इसका जीवंत नमूना है 
यह महाराष्ट्र का महा-सर्कस || 6 ||
लेखक के बारे में
डॉ. रामकृष्ण सिंगी
डॉ. रामकृष्ण सिंगी ने मध्यप्रदेश के शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालयों में 40 वर्षों तक अध्यापन कार्य किया तथा 25 वर्षों तक वे स्नातकोत्तर वाणिज्य विभागाध्यक्ष व उप प्राचार्य रहे। महू में डॉ. सिंगी का निवास 1194 भगतसिंह मार्ग पर है। डॉ. सिंगी देवी अहिल्या विश्वविद्‍यालय इंदौर (मप्र) के वाणिज्य संकाय.... और पढ़ें