-डॉ. निरुपमा नागर रंगों से सराबोर हो हो गई मैं तो बावरी। कितने रंग देखे लाल, काले, हरे, पीले, देख न सकी मैं रंगों के पीछे की होली होली खेलन चली मैं मतवाली। रंग रहे सब एक-दूजे को आरोपों की चलाकर पिचकारी प्यार का रंग चलाकर...