dharma sangrah
✕

कविता : सुनो, सुन रहे हो ना तुम

Updated: मंगलवार, 12 फ़रवरी 2019 (11:50 IST)
सुनो, सुन रहे हो ना तुम
रोज तुम सबेरे मेट्रो से 
ऑफिस निकल जाते हो 
देर रात को घर खिसियाते हुए से आते हो 
झल्लाए गुस्साए मुंह घुमाकर सो जाते हो
नहीं करते किसी से सीधे मुंह बात
ऐसा क्या हो गया तुमको अकस्मात्
सुना है ऑफिस में महिला सहकर्मी से 
बहुत मुस्कराकर बतियाते हो
बॉस की बात बिना सुने 
हां हां करके मूंड़ी घुमाते हो 
मैं कैसे बताऊं कि वर्षों पहले 
तुम्हारा लगाया हुआ गुलाब का पेड़
पड़ोसी की बोगन बेलिया से आंखें लड़ाता है
और वर्षों पहले लगाई गई रातरानी 
अब बड़ी हो खिलखिलाने लगी है
हां कुछ भौंरे जरूर मंडराने लगे हैं
मैं तुम्हारी बेरुखी को दर किनार कर 
तुम्हारे फूलों को सजाती संवारती हूं
और तुम्हारी निष्ठुरता से तंग आकर 
मैंने भी लिखना शुरू कर दिया है 
कैनवस पर कविता 
किंतु स्याही से नहीं आंसु्ओं से 
क्या तुम उसे पढ़ सकोगे? 
 
लेखक के बारे में
राकेशधर द्विवेदी

Show comments

सभी देखें

मच्छर के काटने से खुजली क्यों होती है? जानें वैज्ञानिक कारण और उपचार

Health Tips: बॉड़ी में शुगर कम होने पर क्या-क्या परेशानियां होती हैं, जानें काम की बातें

हाथों और आंखों में छिपे हैं लिवर की बीमारी के संकेत! भूलकर भी न करें इन्हें नजरअंदाज

बारिश के मौसम में चाय के साथ बनाएं ये 5 परफेक्ट कॉम्बिनेशन वाले क्रिस्पी स्नैक्स, हर कोई करेगा तारीफ

समय रहते अगर हो जाए लक्षणों की पहचान, तो कैंसर जैसे रोगों का उपचार भी संभव

सभी देखें

रूस दे रहा है नाटो को परमाणु हथियारों की धमकी, NATO कमांड केन्द्रों पर हो सकते हैं हमले

शारदीय नवरात्रि व्रत 2026: रोज-रोज साबूदाने की खिचड़ी खाने के 6 नुकसान

सबके लिए समय है... फिर अपने सपनों के लिए क्यों नहीं?

कब मनाया जाएगा विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस? जानें कब हुई इसकी शुरुआत और क्‍या है उद्देश्‍य?

Maharaja Agrasen Jayanti: कौन थे महाराजा अग्रसेन? 5000 साल पहले दी थी ऐसी न्यायनीति, जानकर रह जाएंगे हैरान

अगला लेख