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Wed, 5 Aug 2026

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हिन्दी कविता : मन की गांठ

hindi poem
मन की गांठ 
बोई नहीं जाती
ग्लैडुला की गांठ की तरह
जो अपनी बगिया महकाए
भाए आंखों को
 
मन की गांठ
बांधी नहीं जाती
बंधनी की गांठ की तरह
जो अपना धरातल सजाए
ओढ़नी ओढ़ाए नातों को
 
मन की गांठ
लाई नहीं जाती
प्याज की गांठ की तरह
जो परत-दर-परत खुलती जाए
बढ़ाए रसोई के स्वादों को
 
मन की गांठ
लग जाती है 
कर्कटी गांठ की तरह
दुखती, चुभती फैलती जाए
टाल दो कर प्रेमयुक्त संवादों को।