नंदन-कादंबिनी के बंद होने में क्या पाठकों का कोई दोष नहीं : चित्रा मुद्गल

देश के करोड़ों-करोड़ों हिंदी बोलने, पढ़ने, लिखने वालों के होते हुए कादंबिनी और नंदन का बंद होना बेहद-बेहद लज्जा की बात है। यह विराट हिंदी पट्टी से आत्मविश्लेषण की मांग करता है कि जो कुछ हुआ, वह क्यों हुआ और क्यों नहीं होना चाहिए था और इसके लिए क्या हिंदी पट्टी के अंतर्विरोधी हिंदी प्रेम को प्रश्नांकित नहीं किया जाना चाहिए?

इस प्रश्न को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि व्यवस्थापक हिंदी विरोधी हो रहे हैं। उनकी दिलचस्पी उनके द्वारा प्रकाशित साहित्यिक हिंदी पत्र-पत्रिकाओं से उचट गई है, या उचट रही है। इसके पूर्व इसी संस्थान से प्रकाशित साहित्य की अत्यंत लोकप्रिय पत्रिका साप्ताहिक हिंदुस्तान को बरसों पहले बंद कर दिया गया था।

तर्क दिया जा सकता है कि अब समय आ गया है। क्यों न विशाल हिंदी भाषी पाठकों को कठघरे में खड़ा करते हुए, उनके हिंदी प्रेम और दायित्व की पड़ताल की जाए कि अगर कादंबिनी और नंदन घाटे में चल रहीं थीं तो क्यों चल रहीं थीं। उनके बंद होने की नौबत क्यों आई। क्या उनके बंद होने में पाठकों का कोई दोष नहीं? उनकी लगातार गिरती प्रसार संख्या किस बात की ओर संकेत कर रहे हैं। और यह कहना भी नादानी होगी कि पाठक बाज़ार के उस गणित से परि‍चि‍त नहीं हैं कि प्रसार संख्या पर विज्ञापन निर्भर करते हैं और विज्ञापन ही पत्र-पत्रिकाओं के जीवित रहने का आधार बनते है।

दुख इस बात का है कि हम अपनी भाषा को बचाने के लिए अपनी जेबों को ढीला नहीं करते। इस बात की महत्ता ही नहीं समझते कि हमने अपने बच्चों को नंदन से वंचित करके उन्हें अपनी मात्र भाषा के प्रति संवेदनशील होने से वंचित किया है। भारतीय संस्कारों से संस्कारित होने से वंचित किया है। नैतिकता और मूल्यों से वंचित किया है। उनकी कल्पनाशीलता के विकास को कुंठित किया है। उनकी चेतना को अवरुद्ध किया है। क्यों हम यथार्थ से टकराने से बचते हैं और ऊपर से अपनी मातृभाषा से प्रेम का पाखंड रचते है और अंग्रेज़ी की मजबूरी का रोना रोते हैं।

जाहिर है कि कोइ भी व्यवसायी अपने मिशन भाव को कब तक घाटे में रखकर चलाएगा, उसे जिंदा रखेगा जब पाठक ही अपनी मात्र भाषा की पत्र-पत्रिकाओं से जुड़ने की बजाए अंग्रेज़ी की पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ने में दिलचस्पी रखता हैं और अपनी संतानों को भी अंग्रेज़ बनाना चाहता है।

मैं पाठकों को बताना चाहूंगी, हमारे यहां अखबार साढे 5 रुपए में हमें मिलता है जबकि पाकिस्तान में मैंने पाया कि वहा एक अखबार 25 रुपए का मिलता है और मैं उन अखबारों को भी खरीद नहीं सकती जिनमें मेरे साक्षात्कार प्रकाशित हुए हैं। और कम कीमत में पत्र-पत्रिकाओं का मिलना विज्ञापनों की वजह से ही संभव होता है।

दुख तो इस बात का है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी हमने अपने समाज में पुस्तक संस्कृति को पुष्पित नहीं किया है जो कि किसी भी विकासशील समाज की नई पीढ़ी को चेतना संपन्न बनाने के लिए सबसे जरूरी नींव का पत्थर हैं। महंगाई हमें पत्र-पत्रिकाओं में ही दिखती है। विशेषकर मात्र भाषाओं की पत्र-पत्रिकाओं के संदर्भ में। हालांकि चेतने की आवश्यकता है कि अंग्रेज़ी के मुक़ाबले हिंदी के अखबारों की प्रसार संख्या बहुत ज़्यादा है। लेकिन आने वाले खतरों से हम बच नहीं सकते। हमे गंभीरता से इस दिशा में सोचना होगा। मैं इस बात को खुलकर कहना चाहती हूं, महंगाई हमें महेंगे कपड़ों और महेंगे सिनेमा टिकटों में नहीं अखरती, साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं और किताबों में अखरती है।

बहुत से अभिवावकों का ये तर्क है कि अब तो ऑनलाइन सब मिल जाता है। अंग्रेजी में सब कुछ मिल जाता होगा, लेकिन मुझे नहीं लगता कि हिंदी और अन्य मात्र भाषाओं का साहित्य और बाल साहित्य उस परिमाण मे उपलब्ध होगा। फिर पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं की बात ही और है।

विदेशी समाज में भी अब इस बात को गहरे महसूस किया जा रहा है कि पुस्तकों का विकल्प डिजिटल प्लेफॉर्म नहीं बन सकते। अपनी पसंद की पत्रिका को बच्चे अपनी संपत्ति समझकर सहेजते हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री उनकी निजी संपत्ति नहीं बन पाते। वे उनकी कल्पनाशीलता को कुंठित करते हैं। न उनकी शोध प्रवृति का समुचित विकास हो पाता है। पत्र-पत्रिकाएं यदि उन्हें अपने घर में नहीं उपलब्ध होंगी तो वह वाचनालय जाने की ज़ेहमत नहीं उठाएंगे। क्‍योंकि घर में यह सुविधा होती है कि वह अपनी पढ़ाई करते हुए जब जी चाहे तब अपनी पसंद की पत्रिका को पढ़ सकते है। जाने कब हम बच्चों के मनोविज्ञान को समझ पाएंगे। उन्हें पुस्तक संस्कृति के संस्कार से दीक्षित कर सकेंगे।

यह बात भी मुझे गहरे क्षुब्ध करती है कि व्यावसायिक पत्र-पत्रिकाओं को गरियाने और कोसने का प्रचलन साहित्य जगत मे काफी पुराना है।
और उनके बंद होने पर छाती पीटने का भी। उनके जीते जी उन्हें गंभीर साहित्य की श्रेणी से विलग कर दुत्कारने का भी। हां, यह भी सत्य है कि कभी-कभी व्यवसायिक संस्‍थान भारी मुनाफे के प्रलोभन के चलते, पटरी बदलना आवश्यक समझते हैं। टाइम्स ऑफ़ इंडिया इसका महतवपूर्ण उद्धरण है। "धर्म-युग, माधुरी, इलस्ट्रेटेड वीकली और सारिका" जैसी चलती हुई पत्रिकाओं को उन्होंने सर्कुलेशन गिराकर इसलिए बंद कर दिया कि साहित्य में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। ऐसा नहीं है कि यह पत्रिकाएं घाटे में चल रही थीं। लेकिन यह भी विचारणीय मुद्दा है कि समय रहते न साहित्यकारों ने, न ही साहित्य के पाठकों ने उनके इस अन्यायभरे रवैये का संगठित विरोध किया।

वैसे भी लोग नहीं जानते कि पत्रकारों की नौकरियां अब अनुबंधों की मोहताज हो गई है। पालैकर अवार्ड से लेकर जितने भी अन्य अवार्ड पत्रकारों के हितों की रक्षा करने के नाम पर आगे आए वह भी उनके बुनियादी अधिकारों की रक्षा नहीं कर सके।



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