सवाल ये है कि बनारस कैसे जीतेगा और कब?

सुबह–ए–बनारस...

Author जयदीप कर्णिक|
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बनारस.... काशी.... वाराणसी.... अविमुक्त क्षेत्र... आनंद कानन.... ब्रह्मावर्त... जो भी कह लें... कुछ तो जादू है गंगा किनारे बसी इस नगरी में। शिवजी के त्रिशूल पर धरी इस नगरी में तीन नदियाँ हैं (थीं) ... वरुणा, असि और गंगा। ये तीनों ही मिलकर वो अर्धचंद्र भी बनाती हैं ... अर्धचंद्र जो शिवजी की जटाओं पर भी धरा है। इन पौराणिक आध्यात्मिक प्रतीकों का रहस्यमयी संयोग है या उन महामनाओं का पुण्य जिन्होंने इस नगरी को गुलज़ार किया... ये ठीक-ठीक पता लगाना मुश्किल है, पर ये बात तो पक्की है कि कोई चुंबक यहाँ गड़ा हुआ है जो खींचता है, बुलाता है, रोकता है... कबीर ने जाने क्या किया था कि इस चुंबकत्व को तोड़ पाए, सबके बस की तो है नहीं।
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उसके बाद सीधे अब जाना हुआ.....वो पुराने बिम्ब और वो आध्यात्मिक महत्व और इतिहास अब भी दिमाग पर छाया था। चुनाव के ताज़ा कौतूहल से ज़्यादा उन बिम्बों से ख़ुद को जोड़ने की उत्सुकता थी। यों भी अब चुनाव कुछ ऐसे हो गए हैं कि काशी नहीं गए तो पत्रकारों को भी मोक्ष मिलता दिख नहीं रहा... सो अपन भी पहुँच ही गए। जब पहुँचे तो दिमाग पर वही छवि अंकित थी जो ऊपर भूमिका में लिखी है... दो दिन बनारस घूमने के बाद ख़ुद को बहुत समझाया था कि शुरुआत अब इस आध्यात्मिक छवि से नहीं करूँगा.... क्योंकि इस छवि की आड़ में ऐसा बहुत कुछ है जो छुप रहा है, दब रहा है, सिसक रहा है और उघाड़े जाने की तमाम कोशिशों के बाद भी सामने नहीं आ पा रहा है...। मैं नकारात्मक नहीं होना चाहता। लेकिन कई बार हमारी आस्था इतनी प्रगाढ़ और अंधी है कि वो सब चाह के भी हमें नहीं दिखता जो दिखना चाहिए।



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