यादों को खास बना देती हैं दोस्ती

निस्वार्थ भाव से होती है दोस्ती

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फ्रेंडशिप डे के लिए एक दिन मुकर्रर करना तो उनके लिए है जो अब अपने स्कूल के दोस्तों को ऑरकुट या फेसबुक से ढूँढते हैं।

मूवी का पहला शो देखना है पर जेब तो खाली है। फिर पैसों का मिलकर जुगाड़ करना, बस में बिना टिकट के सवारी करना और चेकर के पकड़ने पर रौब से कहना स्टाफ है, घरवालों से झूठ बोलना और गलत बातों के लिए भी उनसे भिड़ जाना, घर में बिना बताए नाइट शो देखना, भूख लगी है तो नए कपड़े पहनकर किसी की शादी में लड़के या लड़की वालों की तरफ से चले जाना और वापिस लौटकर पेट पकड़-पकड़ कर हँसना, ऐसी अनगिनत स्मृतियाँ हैं जो दोस्ती के नाम पर याद आती हैं।

दोस्त ही वह शख्स होता है जो आपके जीवन के सभी राज जानता है। दोस्ती की कसम देने की देर होती थी की काम हो जाता था। फिर सब एक-दूसरे की कमजोरी भी जानते थे। दोस्ती में बिना शब्दों के अभिव्यक्तियाँ भी बहुत कुछ कह जाती हैं। आखिर ये सब दोस्ती में ही तो चलता है। यह एक ऐसा रिश्ता है जो मामूली घटनाओं और यादों को भी खास बना देता है। हमारे जहन में ऐसे बहुत से पलों को ताउम्र के लिए कैद कर देता है। ये पल वापिस तो कभी नहीं आते पर हाँ आज भी जब आप अपने पुराने दोस्तों से मिलते हैं तो अब उन बातों को याद कर जरूर हँसी आती होगी।

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इस बारे में लीना सिंह कहती हैं कि मैं दोस्तों से आज भी उतनी ही शिद्दत से मिलती हूँ जैसे पहले मिलती थी। मैं अभी भी अपनी स्कूल की दोस्तों के साथ जब मिलती हूँ तो हम सब पुरानी बातों को याद कर हँस पड़ते हैं। किस तरह मैं क्लास के बीच में छुप-छुपकर पूरा टिफिन खा लेती थी और पीटी के समय पीटी से बचने के लिए अपने दोस्तों के साथ पेड़ के पीछे छुप जाती थी।

बेशक अब 'बिजी लाइफ' के चलते रोज मुलाकात नहीं हो पाती, फोन पर बात नहीं हो पाती पर इतना जरूर है कि जब भी बात होती है फिर सबकुछ भूलाकर बस दोस्ती की ही बातें चलती रहती हैं।

दोस्ती के लिए कोई दिन तय कर उसे फ्रेंडशिप डे का नाम दे देना कितना सही है यह कहना थोड़ा मुश्किल है। पर इतना जरूर है कि जिस दिन पुराने यार सब मिल बैठ जाएँ उनके लिए वही फ्रेंडशिप डे हो जाता है।

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डॉक्टर हरीश भल्ला कहते हैं कि मेरे दोस्त आज भी मेरे लिए उतने ही खास हैं जितने पहले थे। बेशक समय नहीं मिल पाता लेकिन फिर भी महीने में एक बार हम सब मिलने का प्लान बना लेते हैं और मिलकर फिर से बच्चे बन जाते हैं। मेरी दोस्ती अपने स्कूल तक के दोस्तों के साथ कायम है। उन दिनों जब मैं कॉलेज में था तो कॉलेज में कविता पाठ जैसे बहुत से कार्यक्रम होते रहते थे। उस दौरान मेरा एक दोस्त बना निखिल कौशिक। वह भी कवि सम्मेलन में भाग लेता रहता था।

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- पूजा डबा
अब वह लंदन चला गया और आज वह विदेश में आँखों का बहुत बड़ा डॉक्टर बना गया है। कुछ दिन पहले मेरे घर पर पार्सल आया जिसमें एक वीडियो सीडी मुझे मिली। उसे जब मैंने देखा तो मेरी आँखों से आँसू गिरने लगे। उसमें मेरे उस दौर के सभी फोटो थे जिसे निखिल ने अपने कैमरे में कैद कर लिया था। ऐसे निस्वार्थ भाव से होती है दोस्ती।



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