पर्यावरण संवाद सप्ताह : चौथे दिन इंदौर के ऐतिहासिक वृक्ष प्रेम पर बात


द्वारा सप्ताह के चौथे दिन पर्यावरणविद ओपी जोशी व अम्बरीश केला ने अपने विचार रखे। संवाद की शुरुआत में ओपी जोशी ने कहा कि इंदौर अपने वृक्ष प्रेम के लिए पहचाना जाता रहा है लेकिन अब हम यहां भी तेजी से जैवविधता खो रहे हैं।

इंदौर के वृक्षों और उनकी विविधता की रोचक जानकारी साझा करते हुए उन्होंने कहा कि इंदौर में कई मोहल्लों, गलियों और बाज़ारों के नाम पेड़ों पर हैं मसलन पीपली बाज़ार, खजूरी बाज़ार, मोरसल्ली गली, इमली बाज़ार, बड़वाली चौकी और पलासिया। नवलखा कभी नौ लाख पेड़ों के कारण इस नाम से जाना गया। शहर के कई वृक्ष क्षेत्र एवं देश के इतिहास से जुड़े हैं।

संवाद नगर में 250 वर्ष पुराना बरगद है जहां से प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेज़ कर्नल डूरंड को महू भागना पड़ा था। रेसीडेंसी में एक पुराना बरगद है जहां शआदत खान को फांसी दी गई। एम वाय में एक 230 वर्ष पुराना नीम का पेड़ है जिस पर 10 फरवरी 1858 को हमजारा के राजा राणा बख्तावर सिंह को उनके 12 साथियों के साथ फांसी दी गई। कृषि महाविद्यालय के मुख्य द्वार पर महात्मा गाँधी द्वारा 1935 में लगाए गए दो नीम के पेड़ हैं।
भारत के प्रथम राष्ट्रपति श्री राजेन्द्र प्रसाद जी द्वारा रोपित मोरसल्ली का पेड़ आज भी पागनिसपागा के एक परिसर में मौजूद है।नवलखा स्थित विसर्जन आश्रम में विनोबा भावे के हाथ का लगा बरगद का वृक्ष मौजूद है। इमली साहब गुरुद्वारा का नाम उस इमली के पेड़ की वजह से पड़ा जहां गुरु नानक ने प्रवचन किए थे।

क्रिश्चियन कॉलेज का इमली का पेड़ प्रसिद्ध फिल्मकार एवं व्यंग्यकार श्री श्रीनिवास जोशी को बहुत प्रिय था और वे अपनी रचनात्मकता का श्रेय उसी पेड़ को देते थे।
इंदौर में आम, अमरूद, नीम, आंवला तो बहुतायत में रहे लेकिन सफ़ेद और पीला पलाश, रुद्राक्ष, सीता अशोक, नागलिंगम, नागफन के, पारस पीपल,गणेश चम्पा, शमी, मांडव इमली,खरपा रेवड़ी भी यहां उपलब्ध रहे। आवश्यकता इस बात की है कि इंदौर के वृक्ष प्रेम के समृद्ध इतिहास, आज के उपलब्ध वन्य सम्पदा का व्यवस्थित लेखा जोखा रखा जाए।



इंदौर के ग्रीन हीरो अम्बरीष केला
ने कहा कि हमारा शहर मालवा पठार में समुद्र तल से 550 फ़ीट पर 550 वर्ग किलोमीटर में फैला एक महत्वपूर्ण के आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध नगर है। साफ सफाई और रख रखाव में वर्षों से अव्वल आने वाला इंदौर भारत में एक उदाहरण बन के उभरा है।

अब इंदौर को पर्यावरण संबंधित क्षेत्रों, मृदा, वायु और जल में भी अग्रणी बनने कि और बढ़ना ही होगा। उन्होंने कहा मिट्टी जीवित पोषक है जिसका अपना जीव तंत्र है। विगत वर्षों में जल एवं वायु क्षरण और रासायनिक खाद और कीटनाशकों के बेतहाशा उपयोग से इसकी उर्वरकता और स्वास्थ्य नष्ट हो रहे हैं।

इसे बचाने के लिए आवश्यक है कि जैविक कृषि, वृक्षों,विविध फसल से इसे समृद्ध बनाया जाए। अगर हम सभी अपने घरों में जैविक उगाएं, जैविक खाएं और कम से कम रासायनिक पदार्थों का उपयोग करें तो अपने स्वास्थ्य के साथ परिवेश भी सुधरेगा। उन्होंने बायो एंजाइम का उदाहरण दिया जो हानिकारक फिनाइल की जगह नींबू के छिलकों और गुड़ से घर में ही बन सकता है। जल संवर्धन और संग्रहण पर उन्होंने कहा कि बदलते मौसम से वर्षा भी अनिश्चित हो चुकी है। इंदौर में औसतन 36 इंच वर्षा होती है।
अगर इसे संचयित करें तो नगर को 70 किलोमीटर दूर नर्मदा के पानी पर जीने की आवश्यकता नहीं होगी। सोक पिट्स से भूजल बढ़ाकर हम नर्मदा को शोषण से बचा सकते हैं। खेतों में या बड़े भूखंडों में ट्रेंच पद्धति से पानी को ज़मीन में उतारा जाना चाहिए। बहुत कम खर्च से ग्रे वाटर पुनरुपयोग से हम अपना दैनिक खर्च भी कम कर सकते हैं। पानी भी बैंक में पैसों की तरह है। खाते में जितना डालें उतना ही निकाल सकते हैं।
नगर के स्तर पर तालाबों और झीलों को चिन्हित जगहों पर प्राथमिकता से बनाना चाहिए। जैविक और कम पानी वाली फसलों से भी जल की बचत हो सकती है।

उन्होंने अपनी संस्था साइंटेक इको फाउंडेशन के वर्षों से पेड़ लगाने और उन्हें बचाने के प्रयासों के बारे में बताया। सीड बॉल्स से दीदी द्वारा सनावदिया पर्वत और भानु पटेल द्वारा रेणुका टेकरी को हरा भरा करने का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि श्री राजेन्द्र सिंह जी पेड़ों को बचाने के प्रति जो समर्पण दिखाते हैं वह प्रेरणा है।
जापानी तकनीक मियावाकी फॉरेस्ट पद्धति से सघन वन लगाने के बारे में उन्होंने बताया कि कैसे छोटे छोटे उपलब्ध भूखंडों पर भी 3 से 4 वर्ष में ही 20 से 30 फ़ीट ऊंचे पेड़ों से भरा वन बन सकता है।

नगर निर्माण तो अपनी जगह आवश्यक है परंतु उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है कि हम पेड़ लगाएं, जगह नहीं है तो गमले लगाएं, सौर ऊर्जा अपनाएं। कार्यक्रम की संयोजक डॉक्टर ने कहा कि शहर को अब ऐसे प्रयासों को अपनाने की शीघ्र जरूरत है।




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