Gondwana Queen Rani Durgavati: भारतीय इतिहास में अनेक वीर योद्धाओं और वीरांगनाओं ने अपने साहस, त्याग और देशभक्ति से अमिट छाप छोड़ी है। ऐसी ही महान वीरांगनाओं में रानी दुर्गावती का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। उन्होंने न केवल अपने राज्य की रक्षा के लिए शत्रुओं का डटकर सामना किया, बल्कि मातृभूमि और स्वाभिमान की रक्षा के लिए अपने प्राणों का भी बलिदान दे दिया।
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रानी दुर्गावती का बलिदान दिवस हमें उनके अदम्य साहस, नेतृत्व क्षमता और राष्ट्रप्रेम की याद दिलाता है। आज भी उनका जीवन देश की महिलाओं और युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।
आइए, उनके इस शौर्य दिवस पर जानते हैं मध्य प्रदेश के गोंडवाना साम्राज्य की इस महान रानी की वीरता और बलिदान की अमर गाथा...
चंदेल राजवंश की बेटी, गोंडवाना की रानी
रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524 को कालिंजर के राजा कीर्तिसिंह चंदेल के यहां हुआ था। उनका विवाह गोंडवाना साम्राज्य के राजा संग्राम शाह के पुत्र दलपत शाह से हुआ था। विवाह के कुछ वर्षों बाद ही राजा दलपत शाह का असमय निधन हो गया। उस समय उनका बेटा नारायण केवल 5 वर्ष का था। ऐसे कठिन समय में रानी ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने छोटे बेटे को सिंहासन पर बैठाकर खुद गोंडवाना की कमान संभाली और जबलपुर को अपना केंद्र बनाकर शासन किया।
एक कुशल और न्यायप्रिय शासिका
रानी दुर्गावती केवल युद्ध कौशल में ही माहिर नहीं थीं, बल्कि एक बेहद दूरदर्शी शासिका भी थीं। उनके शासनकाल में गोंडवाना बेहद समृद्धशाली बना:
* धार्मिक सहिष्णुता: वे हिंदू धर्म की अनुयायी थीं, लेकिन उन्होंने अपने राज्य में जैन और अन्य संप्रदायों के विकास के लिए भी खुलकर दान दिया।
* जल संरक्षण: उन्होंने अपने राज्य में पानी की कमी को दूर करने के लिए कई तालाबों का निर्माण कराया, जिनमें जबलपुर का प्रसिद्ध 'चेरीताल' और 'आधारताल' आज भी उनके नाम की गवाही देते हैं।
अकबर की सेना से ऐतिहासिक टकराव
गोंडवाना की समृद्धि और एक महिला के बढ़ते प्रभाव को देखकर मुगल सम्राट अकबर विचलित हो उठा। उसने अपने सिपहसालार आसफ खान को एक विशाल सेना के साथ गोंडवाना पर आक्रमण करने के लिए भेजा। मुगल सेना आधुनिक हथियारों और तोपों से लैस थी, जबकि रानी की सेना संख्या में कम थी। इसके बावजूद रानी दुर्गावती ने खुद युद्ध का नेतृत्व किया।
1. नरई नाला का मोर्चा
रानी ने जबलपुर के पास 'नरई नाला' नामक स्थान पर मोर्चा संभाला, जो एक तरफ पहाड़ों और दूसरी तरफ उफनती नदी से घिरा था। इस रणनीतिक बढ़त के कारण मुगलों को भारी नुकसान हुआ और वे पीछे हटने पर मजबूर हो गए।
2. रात के हमले का प्रस्ताव
रानी मुगलों को संभलने का मौका नहीं देना चाहती थीं। उन्होंने रात में ही मुगल कैंप पर हमला करने की योजना बनाई, लेकिन उनके सेनापतियों ने रात में युद्ध करने से मना कर दिया। यह देरी भारी पड़ी और अगली सुबह आसफ खान ने बड़ी तोपें मंगवा लीं।
3 अंतिम सांस तक संघर्ष (24 जून 1564)
अगले दिन भयंकर युद्ध हुआ। रानी का बेटा वीर नारायण घायल हो गया, लेकिन रानी लड़ती रहीं। तभी एक तीर रानी की आंख में और दूसरा उनकी गर्दन में आकर लगा। रानी ने होश खोने से पहले स्थिति को भांप लिया।
4 बलिदान (अमर शहादत)
जब रानी को लगा कि वे चारों तरफ से घिर चुकी हैं और बंदी बना ली जाएंगी, तो उन्होंने अपने वफादार सैनिक से खुद पर तलवार चलाने को कहा। सैनिक के मना करने पर रानी ने अपनी ही कटार अपनी छाती में घोंपकर मातृभूमि के लिए प्राण त्याग दिए।
मुगल सेना से घिर जाने पर अपनी अंतिम सांसों के दौरान रानी दुर्गावती के शब्द थे- 'जब तक जीवित हूं, कलंक का टीका नहीं लगाऊंगी। अपमानजनक जीवन जीने से अच्छा है गरिमा के साथ मर जाना।'
5. विरासत और सम्मान
रानी दुर्गावती का यह सर्वोच्च बलिदान भारतीय महिलाओं के आत्मसम्मान और वीरता का प्रतीक बन गया। जबलपुर के पास स्थित 'बरेला' में आज भी उनकी समाधि बनी हुई है, जहां लोग श्रद्धासुमन अर्पित करने जाते हैं।
उनके सम्मान में मध्य प्रदेश सरकार ने जबलपुर विश्वविद्यालय का नाम बदलकर 'रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय' किया। देश उनके बलिदान दिवस पर इस महान वीरांगना के शौर्य, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति को शत-शत नमन करता है।
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