अलाउद्दीन खिलजी की बेटी करती थी इस वीर राजपूत से बेपनाह मुहब्बत

Last Updated: गुरुवार, 30 नवंबर 2017 (14:35 IST)
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पद्‍मावती विवाद के बीच एक ऐसी कहानी भी सामने आई जिसके बारे बहुत ही कम लोगों को पता होगा। राजस्थान में ही एक ऐसा योद्धा हुआ है, जिस पर अलाउद्दीन खिलजी की शहजादी मर मिटी थी। क्या यह प्रेम कहानी परवान चढ़ी या फिर इसका अंत हो गया। पढ़ें पूरी कहानी...

यह कहानी है जालौर के वीर राजपूत राजकुमार की। वीरमदेव को कुश्ती में महारत हासिल थी और वह बहुत ही शूरवीर योद्धा था। उसकी प्रसिद्ध दूर दूर तक थी। मेवाड़ के पास ही जबालिपुर (वर्तमान जालौर) के सोनगरा चौहान शासक कान्हड़ देव का पुत्र वीरमदेव दिल्ली दरबार में रहता था। जब वह यहां रहता था तो अलाउद्दीन खिलजी की बेटी शहजादी फीरोज को वीरम से प्यार हो गया।

कहते हैं कि वीरमदेव की शोहरत और व्यक्तित्व के बारे में सुनकर दिल्ली के तत्कालीन बादशाह अल्लाउद्दीन खिलजी की पुत्री शहजादी फिरोजा का दिल वीरम पर आ गया और शहजादी ने किसी भी कीमत पर उससे शादी करने की जिद पकड़ ली और कहने लगी, 'वर वरूं वीरमदेव ना तो रहूंगी अकन कुंवारी' अर्थात निकाह करूंगी तो वीरमदेव से नहीं तो अक्षत कुंवारी रहूंगी।
बेटी की जिद को देखकर अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी हार का बदला लेने और राजनैतिक फायदा उठाने की सोचकर
अपनी बेटी के लिए जालौर के राजकुमार को प्रणय प्रस्ताव भेजा। कहते हैं कि वीरमदेव ने यह कहकर प्रस्ताव ठुकरा दिया कि...

'मामो लाजे भाटियां, कुल लाजे चौहान,
जे मैं परणु तुरकणी, तो पश्चिम उगे भान…।''
अर्थात : अगर मैं तुरकणी से शादी करूं तो मामा (भाटी) कुल और स्वयं का चौहान कुल लज्जित हो जाएंगे और ऐसा तभी हो सकता है जब सूरज पश्चिम से उगे।

इस जवाब से आगबबूला होकर अलाउद्दीन ने युद्ध का ऐलान कर दिया। कहते हैं कि एक वर्ष तक तुर्कों की सेना जालौर
पर घेरा डालकर बैठी रही फिर युद्ध हुआ और किले की हजारों राजपूतानियों ने जौहर किया। स्वयं वीरमदेव ने 22 वर्ष
की अल्पायु में ही युद्ध में वीरगति पाई।

अंत में तुर्की की सेना वीरमदेव का मस्तक दिल्ली ले गई और शहजादी के एक स्वर्ण थाल में उनका मस्तक उनके सामने रख दिया। इसे देखकर शाहजादी फिरोजा बहुत दुखी हुई तब उसने मस्तक का अग्नि संस्कार किया। बाद में दुखी होकर यमुना नदी में कूदकर अपनी जान दे दी। ऐसी किंवदंति भी है कि जैसे ही फिरोजा सामने आई वीरमदेव के मस्तक ने मुंह फेर लिया।

जालौर राज्य का परिचय : जालौर चौहानों का मुख्य राज्य रहा था। विक्रम संवत 1238 और ईस्वी संवत 1281 नाडोल
के अश्वराज के पोत्र आल्हण के पुत्र कीर्तिपाल परमारों से जालौर छीनकर स्वयं राजा बन बैठे। इतिहास में जालौर का
प्राचीन नाम जाबालीपुर और किले का नाम स्वर्णगिरी मिलता है। जाबाली नामक एक ऋषि का उल्लेख उपनिषदों में मिलता है जो जाबाला का पुत्र होने के कारण जाबाली था। उसी के नाम पर इस तरह के शहर और गांवों के होने का उल्लेख मिलता है।

अलाउद्दीन का जालौर पर आक्रमण : विक्रम संवत 1355 और ईस्वी संवत 1298 में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति
अलगू खां और नसरत खां ने गुजरात विजय अभियान किया। उन्होंने जालौर के कान्हड़ देव से जालौर राज्य से होकर
जाने का रास्ता मांगा परन्तु कान्हड़ देव ने यह कहकर मना कर दिया कि आप विदेशी और विधर्मी हैं। इस उत्तर से अलाउद्दीन खिलजी नाराज हो गया। परन्तु पहले उसके लिए गुजरात जीतना अनिवार्य था। अत: उसकी तुर्की मुस्लिम सेना गुजरात की तरह बढ़ गई और सोमनाथ के मंदिर को तोड़कर वहां बहुत कत्लेआम मचाया। इस खबर को सुनकर कान्हड़ देव ने अलाउद्दीन की सेना पर आक्रमण किया। उसकी सेना को वहां हार का सामना करना पड़ा।


उस वक्त अलाउद्दीन का ध्यान चित्तौड़ और रणथम्भोर के विजय अभियान पर ही लगा हुआ था। अतः जब उसने दोनों
क्षेत्रों को जीत लिया तब उसका ध्यान जालौर पर गया। उसने विक्रमी संवत 1362 और ईस्वी सन् 1305 में अल उल मुल्क सुल्तान के नेतृत्व में एक सेना जालौर भेजी परन्तु मुस्लिम सेना नायक ने आदरपूर्वक संधि का आश्वासन दिलाकर कान्हड़ देव को दिल्ली भेज दिया। कान्हड़ देव का पुत्र वीरमदेव दिल्ली दरबार में रहता था वहां रहते हुए ही शहजादी फिरोजा उन्हें दिल दे बैठी।

जालौर राजवंश : यहां के चौहान सोनगिरा नाम से विख्यात हुए। कीर्तिपाल के पुत्र समरसी थे। समरसी ने गुजरात के
राजा भीम द्वतीय के साथ अपनी पुत्री लीलादेवी का विवाह कर पुनः मधुर संबंध स्थापित किए। समरसी के उतराधिकारी उसके पुत्र उदयसिंह हुए। उदयसिंह ने राज्य की सीमा में विस्तार किया। उदयसिंह ने मंडोर जीता नाडोल को भी अपने अधीन किया। उदयसिंह के पुत्र चाचिंगदेव ने भी राज्य का विस्तार किया। चाचिंगदेव के बाद उनके पुत्र सामंतसिंह ने
खिलजी की बढ़ती हुई शक्ति को देखकर अपने पुत्र कान्हड़देव को जालौर का राज्य दे दिया।



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