ग्वादर पर गदर, मोदी का दोहरे मोर्चे पर लड़ाई का इरादा

Last Updated: सोमवार, 22 अगस्त 2016 (14:51 IST)
बन जाएगा दूसरा बांग्लादेश? 
के लोग और नेता लगातार आंदोलन को तेज कर रहे हैं। उनका दावा है कि जैसे 1971 में पाकिस्तान से कटकर बांग्लादेश बन गया था, उसी तरह एक दिन बलूचिस्तान भी बन जाएगा। बलूचिस्तान के लोग किसी भी कीमत पर पाकिस्तान से अलग हो जाना चाहते हैं। लेकिन क्या यह संभव है? बांग्लादेश के मामले में भू-राजनीतिक स्थितियां भारत के अनुकूल थीं और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अमेरिका के चौथे बेड़े को बंगाल की खाड़ी में भेजने की धमकी देने के बावजूद मुक्तिवाहिनी (जिनमें ज्यादातर भारतीय सैनिक थे) ने बांग्लादेश को स्वतंत्र करा दिया था। 
लेकिन बलूचिस्तान का दूसरा बांग्लादेश बन पाना इतना सरल नहीं है। बड़े पैमाने पर हिंसा, शोषण और फौजी कार्रवाइयों के बाद भी बलूचिस्तान का मुद्दा क्यों अंतरराष्ट्रीय मंच पर नहीं आ सका? इसका कारण है कि बांग्लादेश और बलूचिस्तान की भौगोलिक सामरिक स्थिति में बहुत अंतर है। पूर्वी पाकिस्तान में भी पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण करने से पहले कम से कम तीस लाख लोगों की हत्या की थी और इन कार्रवाइयों पर अमेरिका समेत बहुत से पश्चिमी देशों ने पर्दा डाल रखा था।
 
ठीक इसी तरह बलूचिस्तान के मामले पर जहां पाकिस्तान सत्तर साल तक संयुक्त राष्ट्र, ब्रिटेन, रूस, अमेरिका की आंखों में धूल झोंकने में कामयाब रहा और अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने बलूचिस्तान के मामले पर अपने आंख, कान बंद कर लिए? इसके कारण हैं कि बलूचिस्तान काफी समय से अंतरराष्ट्रीय शक्तियों जैसे ब्रिटेन, रूस और अमेरिका के साथ-साथ अब चीन के हाथों का खिलौना बना रहा है। दूसरी ओर, पाकिस्तान और ईरान अपने सामरिक और आर्थिक हितों को देखते हुए एक दूसरे से सहयोग करने की इबारत गढ़ रहे हैं। इन परिस्थितियों में भारत की क्या भूमिका हो सकती है? क्या वह बलूचिस्तान में भी बांग्लादेश की तरह से सीधे हस्तक्षेप करने की हालत में है? बिल्कुल नहीं,  क्योंकि भौगोलिक परिस्थितियां ऐसी हैं जोकि किसी भी तरह से भारतीय हस्तक्षेप की संभावनाओं को खारिज करती हैं। 
 
जहां तक पश्चिमी ताकतों का सवाल है तो उनके लिए बलोच लोगों की दुर्दशा एक कोलेटल डैमेज से ज्यादा नहीं है क्योंकि पाकिस्तान की 'आतंक के खिलाफ लड़ाई' चलती रहेगी भले ही यह लड़ाई बलोच लोगों के दमन के तौर पर ही क्यों न हो। इस्लामाबाद इस मामले में पश्चिमी देशों को यह समझाने में भी कामयाब हो सकता है कि अगर बलूचिस्तान को आजाद कर दिया गया तो इस क्षेत्र में मध्य पूर्व जैसा आतंक का दानव हावी हो सकता है। भारत ने बलूचिस्तान को नैतिक समर्थन को दे दिया है लेकिन इससे ज्यादा भारत कुछ नहीं कर सकता है। बलोच लोगों की आजादी का ईरान ही विरोध कर सकता है और इस मामले पर भारत को अफगानिस्तान का समर्थन भले ही हासिल हो जाए लेकिन अमेरिका, रूस जैसी ताकतों का सामरिक समर्थन मिलना संभव नहीं लगता।  
 
अब यह देखना बाकी है कि बलोच लोगों की लड़ाई का उपयोग भारत पाकिस्तान के कश्मीर राग को दबाने के लिए करता है या फिर इस मामले को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर जाता है? क्या इस मामले पर यह अफगानिस्तान और ईरान का समर्थन जुटा पाता है और बलूचिस्तान में नरसंहार और मानवाधिकार हनन के मामले को विश्व मंच पर ले जाता है ताकि भारत को अपनी कार्रवाई में अफगानिस्तान, ईरान और अमेरिका जैसे देशों का सहयोग मिल सके ?  इस स्थिति के बिना बलूचिस्तान के दूसरे बांग्लादेश बन जाने की संभावना एक खुश फहमी से ज्यादा कुछ नहीं होगी।
 
भारत उप-महाद्वीप में पाकिस्तान का प्रयोग करने के साथ-साथ अंग्रेजों ने जाते-जाते पाकिस्तान को भी बलूचिस्तान जैसी टेस्ट-ट्यूब स्टेट सौंप दी ताकि इसे भी प्रजातीय और धार्मिक आधारों पर बांटने में सुविधा हो। हालांकि बलूचिस्तान स्वतंत्रता के बाद पाकिस्तान के बनने से पहले ही एक स्वतंत्र देश रहा है जोकि आज भी स्वतंत्र रहना चाहते हैं और वे अपनी अलग सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान बनाए रखना चाहते हैं। एक चौथे कुर्द देश के तौर पर बलूचिस्तान का देश-राज्य का अस्तित्व 1410 से रहा है लेकिन पहले अंग्रेजों की तकड़मों और बाद में जिन्ना ने इसे ठीक उसी तरह पाकिस्तान में मिला लिया जैसेकि पाकिस्तान ने भारत के गिलगित, हुंजा, बाल्टिस्तान को अपना हिस्सा बना लिया।   
 
बलूचिस्तान के पूर्व गवर्नर गौस बख्श बिजेंजो ने बीबीसी के चैनल फोर पर कहा था कि '14 अगस्त को वाइसरॉय के ऑफिस से एक सूचना जारी की गई थी कि कलात के खान, ब्रिटिश सरकार के साथ एक संधि के तहत एक स्वतंत्र संप्रभु देश हैं। तब कलात के मुखिया यार खान ने अपने राज्य को भारत या पाकिस्तान में से किसी में भी मिलाने से इनकार कर दिया था। लेकिन मार्च 1948 में जिन्ना ने यार खान को कैद कर लिया और एक संधिपत्र पर जबरन हस्ताक्षर करवा लिए। तब उनके भाइयों, परिजनों ने पाकिस्तानी सेना का सामना किया लेकिन पाकिस्तान बलूचिस्तान पर जबरन कब्जा करने में सफल हो गया।'
 
पाकिस्तान ने बलोच लोगों की आबादी पर नेपाम और क्लस्टर बमों का भी इस्तेमाल किया है। बलोच लोगों की आवाज को पाकिस्तान ने अपनी ताकत और दुष्प्रचार के जरिए सत्तर साल तक दबाए रखा और कश्मीर के हिस्से को भी अपना बनाए रखा। इसलिए जरूरी है कि बलूचिस्तान के मुद्‍दे को भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पूरी ताकत से उठाए तभी वह पाक-चीन के विस्तारवादी गठजोड़ का सामना करने के बारे में सोच सकता है।



और भी पढ़ें :