ग्वादर पर गदर, मोदी का दोहरे मोर्चे पर लड़ाई का इरादा

Last Updated: सोमवार, 22 अगस्त 2016 (14:51 IST)
में खनिजों का खजाना, फिर भी है बदहाल : बलूचिस्तान में जमीन के ऊपर बलूच, हजारा, सिंधी, पंजाबी से लेकर उज्बेक और तुर्कमेनियाई लोगों की दुनिया बसी है, लेकिन नीचे कोयला और खनिजों का खजाना भरा है। इसके बावजूद इसके करीब सवा करोड़ की आबादी वाला पाकिस्तान का सबसे बड़ा सूबा बदहाली, गरीबी और सरकार की अनदेखी का शिकार है। लंबे समय से यहां के लोग अपनी ज़मीन पर अपने शासन के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जब साल 1840 में यहां अंग्रेज आए थे तभी से प्रतिरोध है, संघर्ष रुक रुककर के चलता रहा है। पाकिस्तान बनने के बाद पांचवीं बार सैन्य अभियान चल रहा है। यह सिलसिला इसलिए चल रहा है क्योंकि ना तो ब्रितानी जमाने में और ना ही पाकिस्तान के शासन में बलूच लोगों के साथ कोई समझौता हुआ। ये लोग अभी तक सरकारी अन्याय के खिलाफ लड़ रहे हैं। 
 
विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान बनने पर काफी ना नुकुर के बाद बलूचिस्तान की सरहदें तो पाकिस्तान में शामिल हो गईं लेकिन लोगों की शिकायतें दूर नहीं हुईं। हालांकि इलाके के नेता पाकिस्तानी शासन तंत्र में शामिल हुए, चुनाव लड़े, उसके संविधान को स्वीकारा, यहां तक कि बलूचिस्तान में विरोध की सबसे बड़ी आवाज़ रहे बलूच नेता नवाब अकबर खान बुगती भी सूबे के मुख्यमंत्री और गवर्नर रहे। ऐसे में कोई हैरानी नहीं कि पाकिस्तान, बलूचिस्तान को अपना अटूट हिस्सा मानता है। 
 
वर्ष 1948, 1958, 1962, 1973, और 2002 में यहां पाकिस्तानी सेना की बड़ी कार्रवाइयां हुईं। इनमें भारी हथियारों का इस्तेमाल और हवाई हमले भी किए गए। 2006 में बलूच नेता नवाब अकबर बुगती को सैन्य प्रमुख से राष्ट्रपति बने परवेज मुशर्रफ ने कत्ल कर दिया। उस वक्त इसे उचित ठहराया गया था। बलूचिस्तान से हजारों की तादाद में लोग लापता हैं और सरकार के पास इसका कोई जवाब नहीं कि ये लोग कहां हैं? गायब हुए लोगों के परिजन सरकार पर ही उन्हें अगवा करने का आरोप लगाते हैं, सड़कों पर उतर कर विरोध करते हैं। पाकिस्तान की सरकार स्थानीय लोगों को ही यहां गड़बड़ी फैलाने का जिम्मेदार मानती है।
 
जानकारों का कहना है कि बलूच विद्रोहियों ने कभी सरकार के खिलाफ जंग नहीं छेड़ी। क्वेटा के पत्रकार सिद्दीक बलोच कहते हैं कि बलूच नेताओं ने पाकिस्तान के साथ कभी जंग नहीं की, मुझे ऐसा कोई वाकया याद नहीं है। ये एकतरफा कार्रवाई है। नवाब बुगती घर में बैठे थे उन्हें मार दिया गया। बीते सालों में पाकिस्तान ने यहां आर्थिक गतिविधियों को तेज करने की कोशिश की है।
 
चीन और ईरान के साथ बड़े करार हुए हैं जिनमें ग्वादर के बंदरगाह पर बड़ी सुविधाएं लाने के साथ ही चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर भी बनाया जाना है। इसके अलावा ईरान से बड़ी गैस पाइपलाइन की भी योजना है लेकिन स्थानीय लोग इससे भी नाखुश हैं क्योंकि वे मानते हैं उनकी शिकायतों पर काम होने की बजाय उनके अधिकार छीने जा रहे हैं। 
 
बलूचिस्तान में इस समय नवाज शरीफ की पार्टी सत्ता में है लेकिन 'कानून व्यवस्था' भी दूसरों के पास है। झाडू़ लगाने का काम भी दूसरे लोग कर रहे हैं। सारा का सारा काम संघीय सरकार के पास है और उसमें बलूच लोगों की कोई नुमाइंदगी नहीं। सरकारी नौकरियों में तो आप बलूच लोगों को ढूंढते रह जाएंगे।
 
 
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