ग्वादर पर गदर, मोदी का दोहरे मोर्चे पर लड़ाई का इरादा

Last Updated: सोमवार, 22 अगस्त 2016 (14:51 IST)
लालकिले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए स्वतंत्रता दिवस के अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बलूचिस्तान, गिलगित, बाल्टिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत उन हिस्सों का जिक्र किया और कहा कि पाक सेना, चीनी सेना की मदद से देश के प्रत्येक प्रांत में पनपने वाले विद्रोह को कुचलना चाहता है।
मोदी ने अपनी विदेश नीति में एक अहम बदलाव करते हुए चीन और पाकिस्तान को इन इलाकों के लोगों की स्वतंत्रता के बारे में बताया और कहा कि पाकिस्तान द्वारा इन्हें 'अपना आंतरिक मामले बताने के बावजूद' ये हिस्से पाकिस्तान के साथ रहना नहीं चाहते हैं। दो वर्ष पहले मोदी ने जहां चीन और पाकिस्तान के साथ समस्याएं सुलझाने के लिए बातचीत का रुख अपनाया था लेकिन दो वर्ष वाद वे भारत के हितों को सुरक्षित बनाने के लिए इन दोनों देशों से दो टूक बात करना चाहते हैं।  
 
में पाक सेना-पुलिस के स्थानीय लोगों पर अत्याचार, भारत की एनएसजी (न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप) सदस्यता को लेकर दोनों देशों का विरोध और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (चाइना-पाकिस्तान इकॉनामिक कॉरिडोर) को लेकर दोनों पड़ोसी देशों को लेकर भारत सरकार की नीति में यह महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है। संभवत: मोदी ने यह महसूस कर लिया है कि द्विपक्षीय मामलों में एक हाथ से ताली नहीं बज सकती है और पाकिस्तान, चीन के साथ विभिन्न मौकों पर समस्याओं का कोई हल निकालने की पहल की, लेकिन चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा और मोदी ने अफगानिस्तान से लौटते समय पाकिस्तान में रुककर अपनी सदाशयता दर्शाई थी। लेकिन इनका कोई सार्थक परिणाम नहीं निकला।  
 
चीन के लिए महत्वपूर्ण है ग्वादर : लेकिन, अब उन्होंने इन देशों का खुले आम विरोध करना शुरू कर दिया है क्योंकि चीन के रवैए को लेकर गिलगित-बाल्टिस्तान और बलूचिस्तान के मामले बहुत अहम हो गए हैं। चीन-पाक का आर्थिक गलियारा, चीनी सेना को बलूचिस्तान तक घुसपैठ करने की छूट देगा। उल्लेखनीय है कि यह गलियारा जहां गिलगित-बाल्टिस्तान से गुजरता हुआ बलूचिस्तान में बने ग्वादर सैनिक अड्‍डे तक चीन के सैनिक आधार और हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) की बढ़ती नौसैनिक ताकत को मजबूत करेगा वहीं दक्षिण चीन महासागर पर चीन के अवैध कब्जे ने भारत की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पिछले कई वर्षों से चीन ने एनएसजी की सदस्यता, दक्षिण चीन सागर से लेकर हिंद महासागर में चीनी सेना के दखल को बढ़ावा दिया है। चीन कहता है कि व्यापार में ट्रेड डिफीसिट का मामला हो या पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद, ये चीन की नजर में 'छोटे-मोटे मामले' हैं।
 
कई सवालों पर जानकारों का कहना है कि भारत की चीन-पाकिस्तान के साथ खुली दुश्मनी सैन्य टकराव का कारण बन जाने की चेतावनी है, वहीं कुछ चीन-पाकिस्तान समर्थक देशों का मानना है कि ये दो अलग-अलग मुद्दे हैं। लेकिन इन तथ्यों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि बलूचिस्तान के ग्वादर पोर्ट को पूरी तरह से चीन के हवाले कर दिया है, जो इसे अपनी नौसैनिक ताकत बढ़ाने के लिए इस्तेमाल कर सकता है। चीन के लिए ग्वादर का सामरिक महत्व भी है क्योंकि यह बंदरगाह नगर खाड़ी देशों के करीब है। चीन का 60 फीसदी कच्चा तेल खाड़ी देशों से आता है। अरब सागर में स्थित यह पोर्ट जल्द ही व्यापार, वाणिज्य का केन्द्र बन सकता है क्योंकि चीन ने इस बंदरगाह के विकासपर 24 करोड़ 80 लाख डॉलर का 80 फीसदी हिस्सा वहन किया है। 
 
चीन दुनिया में अपनी ताकत को तेजी से बढ़ाने के लिए एशियाई देशों, विशेष रूप से भारत के पड़ोसी देशों जैसे नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव और म्यांमार में बंदरगाहों और सैन्य अड्‍डों के विस्तार के लिए भारी वित्तीय मदद कर रहा है। चीन-पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के समझौते से करीब दस वर्ष पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी और मोदी ने इसके सामरिक महत्व और संभावनाओं का सही-सही आकलन कर लिया था।   
 पाकिस्तान से सुदूर दक्षिण-पश्चिमी भाग में बलूचिस्तान प्रांत में अरब सागर के किनारे पर स्थित ग्वादर एक बंदरगाह शहर है। यह ग्वादर जिले का केंद्र है और सन 2011 में इसे बलूचिस्तान की शीतकालीन राजधानी घोषित कर दिया गया था। ग्वादर शहर एक 60 किमी चौड़ी तटवर्ती पट्टी पर स्थित है, जिसे अक्सर मकरान कहा जाता है। ईरान तथा फारस की खाड़ी के देशों के बहुत पास होने के कारण इस शहर का बहुत सैन्य और राजनीतिक महत्व है। पाकिस्तान प्रयास कर रहा है कि इस बंदरगाह के जरिए उसका चीन, अफगानिस्तान व मध्य एशिया के देशों तक भी आयात-निर्यात हो।
 
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