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बात होली में जलते पाकिस्तान की...

बात होली में जलते पाकिस्तान की... - Holi, Pakistan, India, History, Culture
भारत इस समय होली के जश्न में डूबा हुआ है वहीं दूसरी ओर पूरा पाकिस्तान इस समय होली की अग्नि में धधक रहा है। मैं 'पाकिस्तान की आत्मा' बेबस होकर जल रही हूं। कोई होलिका नहीं दिखती मुझे इस ताप से बचाने को। अपने देश को इस स्थिति में पहुंचाने के लिए किसे दोष दूं। नेताओं को, शिक्षाविदों को, धर्म के ठेकेदारों को या कि जनता को? सच कहें तो आज भी इस देश की जनता को मालूम नहीं है कि पाकिस्तान को बनाने का उद्देश्य क्या था? न तो कोई लक्ष्य तय है, न ही कोई इरादा। भेड़ों के झुंड की तरह इस देश की जनता को जिस ओर धकेला जाता है, वह उसी ओर चल देती है।


किसी राष्ट्र की पहचान उसके इतिहास और संस्कारों से होती है। सर्वप्रथम तो हमारे इस देश के कर्णधारों ने इस क्षेत्र के इतिहास को ही होली में जलाया। भारत के इतिहास से जुदा होकर यहां एक ऐसे इतिहास को अपनाया जो यहां का कभी था ही नहीं। हमारे पाठकों को हम बताना आवश्यक समझते हैं कि पाकिस्तानी इतिहास की पुस्तकों में पाकिस्तान के बनने की शुरुआत मुहम्मद बिन कासिम के सन् 711 के आक्रमण के साथ सिखाई जाती है। इन पुस्तकों के अनुसार, तेरहवीं शताब्दी में खिलजियों ने पाकिस्तान के शासन को पूरे उत्तर भारत और बंगाल तक फैला दिया था और सोलहवीं शताब्दी आते-आते हिंदुस्तान पर पूरी तरह पाकिस्तान का कब्ज़ा हो चुका था एवं हिंदुस्तान नक़्शे से नदारद हो गया था।

उनके अनुसार, भारत 1947 में पाकिस्तान से टूट कर अलग हो गया था। अब सोचिए, ये लोग आज़ादी की लड़ाई के परवानों को भूल बैठे हैं और जिहादियों और आतंकवादियों को महिमामंडित करते हैं। वे यहां भी नहीं रुके। फिर इन्होंने अपने ही संस्कारों के साथ होली खेली। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और तक्षशिला की सांस्कृतिक विरासत को विलग कर सदियों से चल रहे अपने रिवाजों, परम्पराओं और मान्यताओं को तिलांजलि दे दी और ऐसी मान्यताओं को अपनाने की कोशिश की जिनसे वे कभी रूबरू थे ही नहीं। यों कौए को हंस की चाल सिखाने की कोशिश की गई, नतीजतन वह कौआ रहा न हंस।

इतिहास और संस्कृति को नष्ट करने के पश्चात् इन्होंने अपनी शिक्षा और उसकी व्यवस्था की होली जलाई। इनकी भौतिक शास्त्र की पुस्तक पढ़ने से समझ में नहीं आता कि विज्ञान पढ़ रहे हैं अथवा धर्मशास्त्र। इस्लाम और पाकिस्तान को विज्ञान का जनक बताया जाता है। विश्व में किसी को भी विश्वास नहीं होगा कि पाकिस्तान में स्कूल की भौतिक शास्त्र की पुस्तकों में न्यूटन और आइंस्टाइन के नाम नहीं हैं। और ऐसे नाम हैं, जो विश्व की किसी पाठ्य पुस्तक में शायद ही मिलेंगे।

उदाहरण के लिए बताया यह जाता है कि इब्ने हाईथम, अल ख़्वारिज़्मी, ओमर खैयाम आदि ने विज्ञान की अनेक खोजें कीं, क्योंकि उनका इस्लाम धर्म में विश्वास मज़बूत था। गणित में आर्यभट्ट को भूलकर ओमर खैयाम को अपनाया। वैज्ञानिकों का भी इस्लामीकरण कर दिया। पाकिस्तान के प्रसिद्ध अख़बार द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के अनुसार, विश्व का कोई भी वैज्ञानिक तर्कों पर परिणाम निकालते हैं और उनके निष्कर्ष नियमों से बंधे होते हैं, किन्तु पाकिस्तान के वैज्ञानिक किसी से बंधे नहीं होते। उनके तर्क, धर्म और चमत्कार पर आधारित होते हैं, जो स्वयं उन्हीं के द्वारा अनुभव किए गए होते हैं।

पाकिस्तान के एक शीर्ष परमाणु वैज्ञानिक का दावा है कि यदि किसी जिन्न को पकड़ लिया जाए तो वह उससे बिजली पैदा करवा सकते हैं और वह बिजली पूरे पाकिस्तान की आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त रहेगी। दुनिया, विकास के मार्ग पर आगे बढ़ रही है। ये पीछे जा रहे हैं। चोरी से परमाणु ज्ञान को अर्जित किया, उसे अल्लाह की देन समझता है और हर सांस में अपने आप को परमाणु शक्ति होने की दुहाई देता है। उनकी इन्हीं कारगुजारियों से अपनी दोस्ती का दम भरने वाले देशों ने भी उन्हें दूर कर दिया है, किन्तु वे इसे किसी अमेरिकी और भारतीय साजिश का हिस्सा मानते हैं।

पाकिस्तान लगभग दिवालिया हो चुका है किन्तु वहां इसका दोष भारत पर मढ़ कर जनता के बीच भारत के प्रति विद्वेष फैलाया जाता है। पाकिस्तान चीख-चीख कर कह रहा है कि हाय! मैं खुद अपने घर को जलता देख रहा हूं और अपने ही लोगों की तालियां सुन रहा हूं। धर्म जल रहा है किन्तु उसे बचाने के लिए कोई होलिका नहीं है। लोकतंत्र को धर्म से और धर्म को सियासत से उलझा रखा है। जहां धर्म और अधर्म में भेद करना मुश्किल हो, वहां होलिका पैदा ही नहीं हो सकती।

भारत के लोग बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने अपने इतिहास और संस्कारों को सहेजकर रखा है इसीलिए तो इन्हें धर्म, विधर्म और अधर्म के भेद मालूम करने के लिए न किसी पुस्तक की जरूरत होती है और न ही पुरोहित की। जो कर्म, अकर्म और विकर्म पर बहस कर सकते हैं। भारत में आप अधर्म को होली में जलाते रहें और पाकिस्तान में धर्म होली में जलता रहेगा जब तक यहां के नेता राजनीति और शिक्षा को धर्म से अलग नहीं कर देते और जनता धार्मिक गुरुओं और धर्म के ठेकेदारों में भेद नहीं कर पाती।
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