क्रांतिदूत चे गेवारा के घर में

-ओम थानवी

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घर में चे की कई तस्वीरें टंगी हैं। शायद बाद में टांगी गई हों। ऐसे चित्रों को संयोजित कर संस्था ने कुछ पुस्तकें प्रकाशित की हैं। चे की नानाविध भंगिमाएं। खेत में ट्रेक्टर चलाते हुए, कारखाने में बोरे ढोते हुए, पांवों से गारा मथते हुए, सार्त्र और सिमोन द बुआ से बात करते हुए, फिदेल के साथ नाव खेते हुए, गोएटे और पाब्लो नेरूदा की काव्य-कृतियां पढ़ते हुए, गोल्फ खेलते हुए, बच्चों से हंसी-ठट्ठा करते हुए। तस्वीरों में चे और जीवंत नजर आते हैं। निश्चय ही वे जानदार ढंग से खूबसूरत थे। क्रांतिदूत वाले प्रचार ने उन्हें मिथ बनाकर रख दिया। ये तस्वीरें देखकर लगा रोष भरे चेहरे की तस्वीरों के पीछे उनकी सहज और संवेदनशील छवि कहीं दब कर रह गई।
उन तस्वीरों से यह भी बखूबी जाहिर होता था कि चे क्यूबा में कितने लोकप्रिय हो गए थे।

क्रांति के फौरन बाद फिदेल ने चे के लिए देश की ‘जन्मना नागरिकता’ घोषित की। यह मान क्यूबा में और किसी को नहीं मिला। साथी लड़ाकों की तर्ज पर क्यूबा के नागरिक भी अपनापे से उन्हें ‘चे’ पुकारने लगे; एक संबोधन जो बाद में उनके मूल नाम पर भारी साबित हुआ। अर्जेंटीना के लोग अजीज को ‘चे’ कहते हैं। चे इस शब्द का अपने वार्तालाप और भाषणों में तकिया-कलाम की मानिंद इस्तेमाल करते थे। लोगों के प्यार को देखते हुए चे ने चे नाम धर लिया। राष्ट्रीय बैंक के अध्यक्ष हुए तो मुद्रा पर दस्तखत की जगह सिर्फ चे लिखा होता था। हालांकि अब क्यूबा के नोट पर खुद चे की तस्वीरें छपी होती हैं। जैसे होसे मार्ती की।

चे के घर की मैंने कुछ तस्वीरें लीं। तब केकी थोड़ा अधीर हो गए। छोड़िए, बहुत हुआ। शायद उन्हें बाहर गाड़ी में प्रतीक्षा कर रहे साथियों की फिक्र भी थी, जो बारिश की झड़ी में न भीतर आते थे, न आगे जा पा रहे थे! मैंने लासारो से मुद्दे की बात शुरू की। उन्होंने बताया कि 1959 के जून-जुलाई माह में चे कुछ देशों की यात्रा पर गए, उनमें भारत शामिल था। मैंने कहा, वह तो ठीक, पर आपके यहां चे के जीवन से संबंधित हर चीज दस्तावेजों में है। उस यात्रा के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकती?

लासारो भीतर गए। एक महिला के साथ लौटे। उसने बताया कि चे हर यात्रा की रिपोर्ट तैयार करते थे। भारत यात्रा की भी है। पर है स्पानी में। मैंने कहा, मेहरबानी कर दे दीजिए। वे कंप्यूटर पर बैठ गईं तो कागज छापने वाली मशीन जवाब दे गई। पर जल्द दुरुस्त हो गई। रिपोर्ट का क-ख मुझे पल्ले नहीं पड़ता था; पर उसे पाकर बड़े सुकून का अहसास हुआ।

लौटकर ‘लोर्का’ के संपादक प्रभाती नौटियाल से मैंने उसका अनुवाद करवाया है। चे के गद्य का कायल रहा हूं। भारत यात्रा की उस तीन पृष्ठ की रिपोर्ट में उसकी झलक निराली है। चे भारत की खूबियां और अंतर्विरोध पकड़ते हैं, महात्मा गांधी के सत्याग्रह की सफलता को स्वीकार करते हैं और नेहरू के बुजुर्गाना आत्मीयता के बर्ताव से अभिभूत होते हैं।

चे के घर से रवाना होने लगे तो लासारो ने क्षण भर रुकने को कहा। भीतर जाकर एक कटारी उठा लाए। छोटी-मोटी तलवार समझिए। अखरोट की लकड़ी पर बारीक नक्काशी। हाथीदांत की मूठ। मैं देखते ही ताड़ गया कि भारत की चीज है। लासारो ने कहा, आपके प्रधानमंत्री नेहरू ने चे को यह भेंट दी थी। कामीलो कह गए हैं, आपसे मालूम करूं कि मूठ के ठीक नीचे यह औरत भला कौन है? मैंने और केकी ने गौर से देखा। एक हाथ में भाला, दूसरे में ढाल, पांव के नीचे अदना-सा शेर। मैंने बताया- शक्ति की प्रतीक देवी है। शायद दुर्गा। पर पक्का मालूम कर बताऊंगा। मैंने कटारी की तस्वीर ले ली।

इस बीच लासारो ने चालू वर्ष के कैलेंडर का एक बड़ा-सा लिफाफा मेरे आगे कर दिया- यह आपके लिए। कामीलो की तरफ से।

मैंने होटल पहुंचकर कैलेंडर खोला। मोटे कागज पर बड़ी-बड़ी तस्वीरें। चे के साथ माओ, मिस्र के राष्ट्रपति नासिर, अल्जीरिया के अहमद बिन बेला... और जवाहरलाल नेहरू! मैं हैरान था। जिस चीज के लिए दिल्ली से लेकर हवाना में भारत के दूतावास तक कितनी दरियाफ्त की; वह बिन मांगे ऐसे झोली में आ गिरी!

चे और पं. नेहरू की उस तस्वीर की प्रति बनवाकर हवाना भारत की राजदूत को भेज रहा हूं। दूतावास की किसी दीवार के लिए वे उसे शायद मढ़वाना चाहें।

चित्र 1. दिल्ली में 1 जुलाई 1959 को होटल अशोका में चे गेवारा। फोटो कुंदन लाल (फोटो विभाग)। सौजन्य : ओम थानवी

चित्र 2. चे गेवारा के घर का चित्र। सौजन्य : ओम थानवी







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