राजनीति के बाजार में नीति

अनिल त्रिवेदी| Last Updated: बुधवार, 1 अक्टूबर 2014 (14:41 IST)
आजादी के कुछ सालों तक देश में व्यवस्था की अराजकता बहस या आंदोलन का मुद्दा होती थी। राजनीतिक चेतना या सक्रियता इस बात को लेकर होती थी कि व्यवस्था ठीक-ठाक और व्यवस्थित कैसे हो?


जैसे रेलें समय पर आएँ-जाएँ, कार्यालय समय से लगें और समय पर काम हो, विद्यालयों में समय से पढ़ाई एवं परीक्षा हो आदि-आदि। राजकाज और समाज में नीति, सिद्धांत, व्यवहार और आचरण भी एक महत्व का मुद्दा था। नैतिक जवाबदारी भी एक आयाम था। जैसे एक रेल दुर्घटना होने की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए तत्कालीन रेल मंत्री लालबहादुर शास्त्री ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।
नैतिकता और उत्तरदायित्व ये हमारे राजकाज की प्रेरणा थे। चुनावों में भी आपसी लिहाज एवं मर्यादा का पूरा ध्यान रखा जाता था। प्रारंभ के दो आम चुनावों में देशभर का राजनीतिक वातावरण लोकतांत्रिक मर्यादा के अनुकूल था। अब सार्वजनिक राजनीतिक जीवन का परिदृश्य पूरी तरह बदल गया है। आज अराजकता बहस का मुद्दा नहीं है। बल्कि पूरे देश में अराजकता की व्यवस्था स्थापित हो गई है। केंद्र से लेकर ग्राम तक सार्वजनिक राजनीतिक जीवन के सूत्र ऐसी शक्तियों के हाथों में चले गए हैं, जिनके प्रति लोगों में भय का भाव है।

राजनीतिक सार्वजनिक नेतृत्व के प्रति श्रद्धा एवं विश्वास का भाव पूरी तरह गायब हो चुका है। राजनीतिक नेतृत्व उपहास का विषय है किसी भी राजनेता के विचार, व्यक्तित्व एवं कृतित्व से सार्वजनिक जीवन में आने की प्रेरणा नई पी़ढ़ी को नहीं मिल रही। पचास की आयु तक पहुँचे लोग भी अपने जमाने के किस्से सुना रहे हैं। सोच की कोई प्रेरणा व काम करने के लिए अब कोई गुँजाइश ही न रही हो।

भारत दिन-प्रतिदिन जवान लोगों का देश बनता जा रहा है, पर भारत की राजनीति में जोश और होश दोनों ही गायब हो रहे हैं। राजनीति के नाम पर सार्वजनिक कलह और लूटमार का बोलबाला है। राजनीति में राजनीति को छो़ड़ बाकी सब कुछ हो रहा है। राजनीतिक दलों, नेताओं और कार्यकर्ताओं और लोकमानस की दूरियाँ बढ़ती जा रही हैं। सत्ता की राजनीति देश निर्माण का संकल्प न होकर सार्वजनिक धन का महाभोज बन गई है।
भूमंडलीकरण के इस दौर में आई नई अर्थनीति ने देश को ऊपर से नीचे तक अपनी जकड़ में ले लिया है। पहले राजनीतिक दलों के बीच अंतर उनकी आर्थिक विचारधारा, सोच, समझ और कार्यक्रम के आधार पर होता था। उनकी तेजस्विता, प्रगतिशीलता और क्रांतिकारिता का प्रेरणाबिंदु आर्थिक सामाजिक कार्यक्रम होता था, पर आज तो लाल, पीले, हरे तीनों रंगों के झंडों को उठाने वाली सारी राजनीतिक जमाते विश्व बैंक, डब्ल्यूटीओ, बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नई आर्थिक व्यवस्था के आगे नतमस्तक हैं कुछ कर नहीं पा रही हैं और राजनीति से अपना-अपना आर्थिक एजेंडा दुनियाभर से एकदम से गायब हो गया है।
चाहे तानाशाही की सरकार हो या सैनिक शासन की सरकार, लोकतांत्रिक शासन प्रणाली हो या राजशाही की शासन प्रणाली, राष्ट्रपति प्रणाली हो या संसदीय प्रणाली सबका मालिक एक। सब की सब सरकारें एक स्तर से भूमंडलीकरण के अर्थशास्त्र को ही सारी दुनिया के सभी सवालों का एक ही हल मानने लगे हैं। दुनिया के सारे राष्ट्राध्यक्ष एवं राजनेता बहुराष्ट्रीय कंपनियों के जनसंपर्क अधिकारी की तरह घूमते नजर आते हैं। विकसित हो या विकासशील या दरिद्रतम सारी अर्थव्यवस्था की दिशा एक ही है- विश्व बाजार। विश्व व्यापार या बाजार के सामने सारे राजनीतिक सोच परदे के पीछे चले गए। विकेन्द्रित एवं लोकाधारित उत्पादन प्रक्रिया इतिहास की वस्तु बनती जा रही है।
राज्य और बाजार ये मनुष्य समाज के विकास के दो ब़ड़े औजार रहे हैं, जिनसे मनुष्य समाज का सोच, समझ और विकास बहुत गहरे से प्रभावित होता रहा है। पहले राज्य का बाजार पर नियंत्रण था। राज्य की बाजार पर धमक थी, पर आज बाजार ने राज्य को अपनी जेब में बंद कर लिया है। आज बाजार राज्य की नीति बनवाता है। राज्य बाजार के सामने उठक-बैठक लगाने को मजबूर हो गया है। जब राज्य ही बाजार का शरणागत हो गया तो राज्य का संचालन करने वाली राजनीति तो बाजार में जा बैठेगी ही सही।
बाजार ही तो राजनीति करने वालों को उनकी दलाली या सेवा का हिस्सा अदा करेगा। मानव समाज ने राज्य का निर्माण या अविष्कार इस खुशफहमी में किया था कि राज्य लोगों के हितों की रखवाली करेगा, पर आज का राज्य तो लूटने वालों की घरवाली बन गया, अब जनता-जनार्दन क्या करे? अपनी किस्मत और भविष्य को बाजार के हाथों गिरवी रख दे?

आज हमारी चेतना के सारे बिंदु बाजार के यहाँ गिरवी हो गए हैं। हमारा राज्य, समाज, धार्मिक क्रियाकलाप, शादी-ब्याह, समारोह, शिक्षा, चिकित्सा, पत्रकारिता, अखबार, पुलिस-प्रशासन सब पर बाजार का इतना गहरा प्रभाव हो गया है कि हम सबका जीवन बाजार का एक प्रोडक्ट हो गया है। हमारी जिंदगी में कुछ ऐसा बचा भी नहीं है, जिस पर बाजार का गहरा प्रभाव न प़ड़ा हो। तो ऐसे हालात में राजनीति परिवर्तन का औजार न होकर बाजार की दलाली बन गई।
बाजार की अर्थव्यवस्था की दिशा लोककल्याण न होकर शुद्ध लाभ होती है। इसी का प्रभाव है कि हमारे देश में बिना संविधान का संशोधन किए 'कल्याणकारी राज्य' की अवधारणा परिसमापन की दिशा में जा पहुँची है। शिक्षा, चिकित्सा, ऊर्जा, स़ड़क, पानी, कप़ड़ा, मकान, रोटी, रोजी, खेलकूद सब बाजार की खरीदो-बेचो, लूटो-खसोटो की गिरफ्त में आ गए हैं। जीवन के ये सारे मुद्दे देश के निर्माण या विकास के कारक न होकर बाजार के विस्तार की मुख्य गतिविधि हो गए हैं।
ऐसे परिदृश्य में बाजार जिसका एकमात्र उद्देश्य बाजार के साम्राज्य को फैलाना है, देश या समाज की ताकत कैसे हो सकता है? बाजार में लोककल्याण की राजनीति नहीं हो सकती वहाँ तो शुद्ध मुनाफे का व्यापार ही संभव है। इसी का नतीजा है कि हमारी राजनीति आज बाजार की शुद्ध दलाल बन चुकी है। इसमें प्रश्न पूछने से लेकर, बहस करने से लेकर, बयान देने या मुद्दा उठाने तक के सारे कार्य लोककल्याण की दृष्टि से नहीं बाजार के पैमाने या माँग पर ही हो रहे हैं।
बाजार की इस फितरत में हमारे पास सोच-विचार का जो टोटा हो गया है, उसे ध्वस्त करना ही बाजार के खिलाफ जीवन की राजनीति को ख़ड़ा करने कि दिशा में पहला मजबूत कदम हो सकता है। अपने निजी सपनों में रंग भरने की जल्दबाजी के चक्कर में हम बाजार की राजनीति को जिस तरह जीवन के हर आयाम में अपनाते जा रहे हैं, उससे हमारे देश के अरमानों का रंग भी उड़ गया है।
राजनीति कोटि-कोटि अरमानों में रंग भरने की लोककल्याणकारी विधा है जिसे बाजार की चकाचौंध के हवाले कर हम देश के सपनों में रंग नहीं भर सकते। हमारे आसपास जो कुछ भी, समाज, शिक्षा, चिकित्सा, लोक-सुविधा, धर्म, राजनीति, परिवार, रोटी-रोजी, खेलकूद, ऊर्जा, सड़क, पानी, संसाधन, प्रबंधन, व्यापार, बाजार, विचार, प्रचार, अखबार के नाम पर जो कुछ भी हो रहा है उसे देखते रहने, भोगते रहने और ताकते रहने से कोई रास्ता नहीं निकलेगा।
रास्ता तो एक ही है बाजार के लिए जीवन के रास्ते को पूरी तेजस्विता से नकार कर हमारी इस धरती पर शाश्वत, सहज, जीवन, जिंदादिली और दरियादिली के साथ हम सबके जीवन की, जीवंतता को कायम रखे यही हमारी सामान्य जिंदगी की एकमात्र चिंता और दिशा होनी चाहिए। बाजार हमारे लिए है हम बाजार के लिए नहीं बने हैं यह संकल्प ही हम सबको बाजार की जक़ड़न की यथास्थिति से निकालकर परिवर्तन की राजनीति का चक्र चला सकता है।



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