संभल ही न पाई श्रीलंकन टीम
स्वरूप बाजपेयी
अगर सामान्य बोलचाल की भाषा इस्तेमाल करें तो दो टेस्ट मैचों की श्रृंखला में ऑस्ट्रेलिया ने श्रीलंका को खड़खड़ा दिया और ऐसा खड़खड़ाया कि अच्छे-खासे खिलाड़ियों से सज्जित श्रीलंका टीम ने बगैर आह-ऊह करे ही विश्व चैंपियन के समक्ष समर्पण कर दिया। होबार्ट की दूसरी पारी में कुमार संगकारा (192 रन) के सचमुच के संघर्ष ने ही थोड़ी लाज बचाने का कार्य किया।
कहा तो यह जा रहा था कि मार्टिन, लैंगर, लीमैन, मॅक्ग्राथ एवं वार्नविहीन टीम को कमजोरी जकड़ लेगी, पर ऐसा हुआ नहीं। श्रीलंका के विरुद्ध तो हैडन, कप्तान पोंटिंग और गिलक्रिस्ट की भी जरूरत नहीं पड़ी।
खास काम तो अपेक्षाकृत नए बच्चों जैसे जैकस, हसी, माइकल क्लार्क और साइमंड्स ने ही निपटा दिया। उधर अकेले ब्रेट ली वास, मुरली, फर्नांडो, मलिंगा के संयुक्त भारीपन पर भारी पड़े। किस्से को सिलसिलेवार यूँ बयान किया जा सकता है।
दो मैचों में ऑस्ट्रेलिया ने मात्र 11 विकेट गँवाए जबकि श्रीलंका ने 40 : ऑस्ट्रेलिया ने प्रति विकेट 118.45 रन बनाए तो श्रीलंका ने प्रति विकेट 29.17 रन बनाए। ऑस्ट्रेलियाई हीरो जैकस ने 318, माइकल हसी ने 299 और माइकल क्लार्क ने 216 रनों का योगदान दिया और मैथ्यू हैडन (93 रन), रिकी पोंटिंग (140), साइमंड्स (103) व गिलक्रिस्ट (67) चुपचाप तमाशा देखते रहे। मजे लेते रहे।
ऑस्ट्रेलिया के जो 11 विकेट गिरे उसमें उन्होंने 5 शतकें व 7 अर्द्धशतकें बना डालीं जबकि श्रीलंका के जो 40 खिलाड़ी लौटे उन्होंने 2 शतकों व 4 अर्द्धशतकों का योगदान दिया। बल्लेबाजी में इस तरह बड़ा ही बेमेल-सा मुकाबला रहा। ऑस्ट्रेलिया की ओर से शतकें भी जैकस (दो), हसी (दो) और क्लार्क (एक) की रहीं, सीनियर खिलाड़ियों की नहीं।
ब्रेट ली की विध्वंसक गेंदबाजी : श्रीलंका की प्रत्येक पारी में चार-चार विकेट अपने नाम दर्ज कराने वाले ब्रेट ली ने 17.56 के किफायती औसत से 16 विकेट लिए। सनद रहे कि श्रीलंका के सभी गेंदबाज मिलकर भी ऑस्ट्रेलिया के 11 विकेट ही ले पाए। तो इस संक्षिप्त श्रृंखला में ब्रेट ली का कद श्रीलंकन गेंदबाजों से काफी ऊँचा रहा।
एमजी जॉनसन ने आठ और स्टुअर्ट क्लार्क ने सात विकेट लेकर ब्रेट ली का बढ़िया साथ निभाया। किस्सा कोताह कि इस संयुक्त पहल पर ही ऑस्ट्रेलिया ने ब्रिस्बेन टेस्ट पारी के अंतर से और होबार्ट टेस्ट 96 रनों से जीता।
श्रीलंकन गेंदबाजों की दुर्दशा : एक तो मुरलीधरन का शेन वार्न को पीछे छोड़ने का इरादा अधूरा रहा। केवल 4 विकेट वे ले पाए और वह भी 100 के औसत से। फिर मुरली ही क्यों, सभी श्रीलंकाई गेंदबाज बेतरह पिटे, वास ने 102 औसत से एक, फर्नांडो ने 104.66 औसत से तीन तथा मलिंगा ने 108.5 औसत से दो विकेट लिए।
घर बुलाकर ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजों ने बेफिक्र होकर उनकी धुनाई की। अब यह तो नहीं कहा जा सकता कि ये सब स्तरीय गेंदबाज नहीं हैं, पर जब कोई अपनी वाली पर ही आ जाए तो क्या किया जा सकता है। ऑस्ट्रेलिया ने ब्रिस्बेन में एकमात्र पारी में 4 विकेट पर 551 रन, होबार्ट में 5 विकेट पर 542 तथा 2 विकेट पर 210 रन बनाते हुए पारियाँ घोषित कीं। तरसा दिया श्रीलंकन गेंदबाजों को।
अंतिम बात : भारतीय टीम को ऑस्ट्रेलिया का ही दौरा करना है। अपनी साज-संभाल हमें अभी से करनी होगी। पिछली बार 2003-04 में तो सौरव गांगुली चार मैचों की श्रृंखला 1-1 से बराबर कर लाए थे।
पर इसके पहले 1999-00 में जब सचिन के नेतृत्व में टीम इंडिया दौरे पर गई थी, तब ऑस्ट्रेलिया ने श्रृंखला के तीनों टेस्ट जीते थे। जैसे यही कम नहीं था। उसने पाकिस्तान से भी श्रृंखला 3-0 से ही जीती थी।
बड़बोले जरूर हैं ऑस्ट्रेलियाई अपनी मैदानी हरकतों में, पर गेंद और बल्ले से भी चोट करने में वे माहिर हैं। तो हमें बच-बचकर चलना होगा।
अगर सामान्य बोलचाल की भाषा इस्तेमाल करें तो दो टेस्ट मैचों की श्रृंखला में ऑस्ट्रेलिया ने श्रीलंका को खड़खड़ा दिया और ऐसा खड़खड़ाया कि अच्छे-खासे खिलाड़ियों से सज्जित श्रीलंका टीम ने बगैर आह-ऊह करे ही विश्व चैंपियन के समक्ष समर्पण कर दिया। होबार्ट की दूसरी पारी में कुमार संगकारा (192 रन) के सचमुच के संघर्ष ने ही थोड़ी लाज बचाने का कार्य किया।
कहा तो यह जा रहा था कि मार्टिन, लैंगर, लीमैन, मॅक्ग्राथ एवं वार्नविहीन टीम को कमजोरी जकड़ लेगी, पर ऐसा हुआ नहीं। श्रीलंका के विरुद्ध तो हैडन, कप्तान पोंटिंग और गिलक्रिस्ट की भी जरूरत नहीं पड़ी।
खास काम तो अपेक्षाकृत नए बच्चों जैसे जैकस, हसी, माइकल क्लार्क और साइमंड्स ने ही निपटा दिया। उधर अकेले ब्रेट ली वास, मुरली, फर्नांडो, मलिंगा के संयुक्त भारीपन पर भारी पड़े। किस्से को सिलसिलेवार यूँ बयान किया जा सकता है।
दो मैचों में ऑस्ट्रेलिया ने मात्र 11 विकेट गँवाए जबकि श्रीलंका ने 40 : ऑस्ट्रेलिया ने प्रति विकेट 118.45 रन बनाए तो श्रीलंका ने प्रति विकेट 29.17 रन बनाए। ऑस्ट्रेलियाई हीरो जैकस ने 318, माइकल हसी ने 299 और माइकल क्लार्क ने 216 रनों का योगदान दिया और मैथ्यू हैडन (93 रन), रिकी पोंटिंग (140), साइमंड्स (103) व गिलक्रिस्ट (67) चुपचाप तमाशा देखते रहे। मजे लेते रहे।
ऑस्ट्रेलिया के जो 11 विकेट गिरे उसमें उन्होंने 5 शतकें व 7 अर्द्धशतकें बना डालीं जबकि श्रीलंका के जो 40 खिलाड़ी लौटे उन्होंने 2 शतकों व 4 अर्द्धशतकों का योगदान दिया। बल्लेबाजी में इस तरह बड़ा ही बेमेल-सा मुकाबला रहा। ऑस्ट्रेलिया की ओर से शतकें भी जैकस (दो), हसी (दो) और क्लार्क (एक) की रहीं, सीनियर खिलाड़ियों की नहीं।
ब्रेट ली की विध्वंसक गेंदबाजी : श्रीलंका की प्रत्येक पारी में चार-चार विकेट अपने नाम दर्ज कराने वाले ब्रेट ली ने 17.56 के किफायती औसत से 16 विकेट लिए। सनद रहे कि श्रीलंका के सभी गेंदबाज मिलकर भी ऑस्ट्रेलिया के 11 विकेट ही ले पाए। तो इस संक्षिप्त श्रृंखला में ब्रेट ली का कद श्रीलंकन गेंदबाजों से काफी ऊँचा रहा।
एमजी जॉनसन ने आठ और स्टुअर्ट क्लार्क ने सात विकेट लेकर ब्रेट ली का बढ़िया साथ निभाया। किस्सा कोताह कि इस संयुक्त पहल पर ही ऑस्ट्रेलिया ने ब्रिस्बेन टेस्ट पारी के अंतर से और होबार्ट टेस्ट 96 रनों से जीता।
श्रीलंकन गेंदबाजों की दुर्दशा : एक तो मुरलीधरन का शेन वार्न को पीछे छोड़ने का इरादा अधूरा रहा। केवल 4 विकेट वे ले पाए और वह भी 100 के औसत से। फिर मुरली ही क्यों, सभी श्रीलंकाई गेंदबाज बेतरह पिटे, वास ने 102 औसत से एक, फर्नांडो ने 104.66 औसत से तीन तथा मलिंगा ने 108.5 औसत से दो विकेट लिए।
घर बुलाकर ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजों ने बेफिक्र होकर उनकी धुनाई की। अब यह तो नहीं कहा जा सकता कि ये सब स्तरीय गेंदबाज नहीं हैं, पर जब कोई अपनी वाली पर ही आ जाए तो क्या किया जा सकता है। ऑस्ट्रेलिया ने ब्रिस्बेन में एकमात्र पारी में 4 विकेट पर 551 रन, होबार्ट में 5 विकेट पर 542 तथा 2 विकेट पर 210 रन बनाते हुए पारियाँ घोषित कीं। तरसा दिया श्रीलंकन गेंदबाजों को।
अंतिम बात : भारतीय टीम को ऑस्ट्रेलिया का ही दौरा करना है। अपनी साज-संभाल हमें अभी से करनी होगी। पिछली बार 2003-04 में तो सौरव गांगुली चार मैचों की श्रृंखला 1-1 से बराबर कर लाए थे।
पर इसके पहले 1999-00 में जब सचिन के नेतृत्व में टीम इंडिया दौरे पर गई थी, तब ऑस्ट्रेलिया ने श्रृंखला के तीनों टेस्ट जीते थे। जैसे यही कम नहीं था। उसने पाकिस्तान से भी श्रृंखला 3-0 से ही जीती थी।
बड़बोले जरूर हैं ऑस्ट्रेलियाई अपनी मैदानी हरकतों में, पर गेंद और बल्ले से भी चोट करने में वे माहिर हैं। तो हमें बच-बचकर चलना होगा।

