एक्सप्लेनर: कोरोना के डेल्टा प्लस वैरिएंट पर कारगर वैक्सीन,डबल के साथ सिंगल डोज वालों को भी संक्रमण का कम खतरा

वैक्सीन की सिंगल डोज वालों को 70 फीसदी संक्रमण का कम खतरा,वायरस के नहीं बनेंगे कैरियर

Author विकास सिंह| Last Updated: बुधवार, 16 जून 2021 (14:53 IST)
देश में कोरोना वायरस के नए डेल्टा प्लस वैरिएंट की मौजदूगी पर सरकार के बयान के बाद की आंशका और ज्यादा बढ़ गई है। कोरोना वैक्सीन को संक्रमण से बचने का एकमात्र हथियार माना जा रहा है। कोरोना की तीसरी लह से पहले सरकार का पूरा जोर वैक्सीनेशन पर है। वहीं दूसरी ओर देश में वैक्सीन की दोनों डोज लेने वालों की संख्या मात्र 4 करोड़ के आसपास है और सिंगल डोज लेने वालों की संख्या 18 करोड़ के आसपास है। ऐसे में कई सवाल उठने लगे है,पहला भारत कोरोना की तीसरी लहर के खिलाफ कैसे लड़ाई लड़ेगा? दूसरा सवाल भारत में मौजूद वैक्सीन नए वैरिएंट पर कारगर है? तीसरा सवाल क्या वैक्सीन की सिंगल डोज लोगों को संक्रमण से बचा सकती है?

इन सवालों को लेकर 'वेबदुनिया' ने भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान संस्था (ICMR) के महामारी विज्ञान और संक्रामक रोग विभाग के पूर्व प्रमुख डॉ. रमन गंगाखेडकर और बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के साइंटिस्ट प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे से बात की।
नए वैरिएंट पर असरकारक वैक्सीन-
कोरोना के नए वैरिएंट को लेकर डॉक्टर रमन गंगाखेडकर कहते हैं कोरोना वायरस से नए वैरिएंट को लेकर अलर्ट रहने की जरुरत है। भारत में मौजूद दोनों वैक्सीन भी कोरोना वायरस के नए वैरिएंट पर प्रभावी है। कोविशील्ड और कोवैक्सीन दोनों ही मौजूदा वैरिएंट पर असरकार है और हम लोगों को अधिक से अधिक वैक्सीन लगवानी चाहिए।

वहीं बीएचयू के प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे कहते हैं डेल्टा प्लस वैरिएंट से घबराने की जरुरत नहीं है क्योंकि देश में कोरोना वैक्सीनेशन का अभियान बड़े पैमाने पर जारी है और लोगों को वैक्सीनेटेड कर वायरस के म्यूटेशन को रोका जा सकता है। कोरोनावायरस के डेल्टा वैरिएंट को रोकने के लिए वैक्सीनेशन काफी कारगर है।

वैक्सीन की सिंगल डोज से संक्रमण का 70 फीसदी कम खतरा-कोरोना वैक्सीन पर बीएचयू की रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना वैक्सीन की सिंगल डोज लगने के तीन सप्ताह बाद संक्रमण का खतरा 70 फीसदी तक कम हो जाता है। बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के जूलॉजी विभाग के प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे कहते हैं कि कोरोना के डेल्टा वैरिएंट पर हमारी स्टडी बताती है कि जिन लोगों को वैक्सीन की केवल एक ही डोज लगाई गई उनमें कोरोना संक्रमण होने का खतरा 70 फीसदी तक कम हो जाता है। वहीं वैक्सीन की सिंगल डोज ले चुके लोग अगर कोरोना संक्रमित होते है तो वह 3-5 दिन में ठीक हो जा रहे है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कोरोना की सिंगल डोज ले चुके लोग अगर संक्रमण की चपेट में आ भी रहे है तो दूसरों को संक्रमित नहीं कर पा रहे है।

कोरोना रिकवर लोगों को वैक्सीन की एक डोज काफी-‘वेबदुनिया’ से बातचीत में प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे कहते हैं कि कोरोना वायरस को लेकर हमारा शरीर में एंटबॉडी दो प्रकार से बनती है पहला व्यक्ति कोरोना संक्रमित हो या उसे वैक्सीन लगी हो। शरीर में बनी यह एंटीबॉडी कुछ समय बाद समाप्त होने लगती है और फिर से कोरोना संक्रमण का खतरा बढ़ने लगता है। लेकिन ऐसा व्यक्ति जब भी संक्रमण की चपेट में आएगा तो हमारे शरीर की मेमोरी सेलस उसको पहचान लेगी और शरीर की बहुत सी एंटीबॉडी बनकर होकर संक्रमण को रोकने का काम करेगी।
इसलिए कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए हर किसी को एक बार वैक्सीनेट होना या संक्रमित होना जरुरी है। संक्रमित होने में डेथ होने का चांस है वैक्सीनेट होने में डेथ होने का कोई चांस नहीं है। अगर कोई व्यक्ति संक्रमित होकर ठीक हो गया है तो सामान्य भाषा में कहे तो इसका मतलब है कि उसको पहला डोज लग गया और ऐसे व्यक्ति को जब वैक्सीन का पहला डोज लग रहा है तो वह दूसरा डोज का काम कर रही है और उतनी ही एंटीबॉडी बन रही है जो वैक्सीन के दो डोज के बाद बनती है। ऐसे में ऐसे लोगों को अगर वैक्सीन की एक ही डोज लगाई जाए तो बहुत सारी वैक्सीन बचाकर जरुरतमंदों को दे सकते है।

ब्रिटेन की रिपोर्ट में दावा-वहीं दूसरी ओर ब्रिटिश स्वास्थ्य विशेषज्ञों की नई रिसर्च मे दावा किया गया है कि वैक्सीन की दोनो डोज ले चुके लोगों में कोरोना का डेल्टा वैरिएंट काफी कम असर करता है। पब्लिक हेल्थ इंग्लैंड (पीएचई) की रिपोर्ट के मुताबिक फाइजर/बायोएनटेक टीके की दो खुराक अस्पताल में भर्ती होने से रोकने में 96 प्रतिशत कारगर है, वहीं ऑक्सफोर्ड/एस्ट्राजेनेका का टीका अस्पताल में भर्ती होने से रोकने में 92 प्रतिशत असरदार है। ब्रिटेन में हुआ अध्ययन इसलिए खास है, क्योंकि डेल्टा वैरिएंट को ही भारत में दूसरी लहर के दरमियान मची तबाही के लिए जिम्मेदार माना जा रहा है।



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