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Written By मनीष शर्मा

नाश ही करता है नशा

नाश ही करता है नशा
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फर्नीचर के एक बहुत ही शालीन और मृदुभाषी व्यापारी की दुकान पर ग्राहकों का ताँता लगा रहता था। वह नियमों का बड़ा पक्का था। इस कारण तय समय पर दुकान खोलता और बंद कर देता था। चूँकि वह अपने परिवार को पर्याप्त समय देता था, इसलिए उसके घर वाले भी उससे खुश रहते थे।

एक दिन वह बचपन के एक दोस्त के साथ घूमने गया। दोस्त जुए का शौकीन था। वह उस व्यापारी को भी जुआघर ले गया। पहले तो व्यापारी ने भीतर जाने में आनाकानी की, लेकिन दोस्त के दबाव डालने पर वह मान गया। घर लौटते समय व्यापारी बहुत खुश था, क्योंकि पहली ही बार जुआ खेलकर वह बहुत बड़ी रकम जीत गया था। इसके बाद धीरे-धीरे उस पर जुए का नशा चढ़ने लगा।

वह अक्सर दुकान बंद कर घर जाने की बजाय जुआघर पहुँच जाता और देर रात को ही लौटता। कहते हैं कि एक लत दूसरी लत को न्योता देती है। उसने शराब पीना भी शुरू कर दिया। इससे हँसी-खुशी भरे घर का माहौल बदलकर तनावपूर्ण हो गया। जब वह जुए में हारकर आता, तो उसका गुस्सा पत्नी पर निकालता था। वह नौकरों और ग्राहकों के साथ भी बद्तमीजी से पेश आने लगा।
  फर्नीचर के एक बहुत ही शालीन और मृदुभाषी व्यापारी की दुकान पर ग्राहकों का ताँता लगा रहता था। वह नियमों का बड़ा पक्का था। इस कारण तय समय पर दुकान खोलता और बंद कर देता था। चूँकि वह अपने परिवार को पर्याप्त समय देता था।      


इससे धीरे-धीरे उसके ग्राहक टूटने लगे। लेकिन उसने इसकी कोई फिक्र नहीं की, क्योंकि उसके सिर पर तो जुए का नशा सवार था। वह सोचता था कि जिस दिन लंबा दाँव लग गया, उस दिन सारा हिसाब-किताब बराबर हो जाएगा। लेकिन वह दिन कभी नहीं आया।

दोस्तो, नशा कोई भी हो, हमेशा नाश ही करता है। जुए के नशे ने ही एक हँसते-खेलते परिवार और अच्छे-खासे चलते व्यापार का नाश कर दिया। जब नशा उतरा तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इसलिए ऐसे किसी भी व्यसन से बचना चाहिए जो अंततः खुद के लिए अहितकर हो। फिर भले ही वह नशा जुए का हो या दारू का या किसी और चीज का। इनका नशा सिर चढ़कर बोलता है और सिर उतरवाकर ही उतरता है।

नशे में चूर व्यक्ति सारी दुनिया से दूर हो जाता है। यहाँ तक कि वह अपना भला-बुरा भी भूल जाता है और इनके हाथों की कठपुतली बन अपने घर व जिंदगी को अपने ही हाथों आग लगा लेता है।

यदि आप भी ऐसे ही किसी नशे के शिकार हैं तो इसके पहले कि आप अपने जीवन में आग लगाएँ, बेहतर है कि उससे पहले जाग जाएँ और नशे की गुलामी की जंजीरों से अपने को आजाद कर लें। तब देखें आपकी और आपके परिवार की किस्मत कैसे पलटती है।

जब आप नशा को उलट दोगे तो शान की जिंदगी ही जियोगे ना। नहीं समझ में आया? 'नशा' शब्द का उल्टा 'शान' ही तो होता है ना। लेकिन विडम्बना यह है कि नशा करने वाले भी इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि इससे उनका नुकसान ही है, लेकिन फिर भी वे इसके ऐसे गुलाम हो जाते हैं कि चाहकर भी इसके चंगुल से निकल नहीं पाते। ऐसे लोग कमजोर इच्छाशक्ति वाले और स्वार्थी होते हैं, जिन्हें अपने सिवाय कुछ नहीं सूझता।

वे अपनी लत को पूरा करने के लिए पूरे परिवार को लानत भेजने से नहीं चूकते। और जिसे अपनों के आँसू पोंछना चाहिए, वही अपनों की आँखों को आँसुओं से भर देता है। यही आँसू एक दिन उस पर बहुत भारी पड़ते हैं। इसलिए इससे जितनी जल्दी हो सके, पीछा छुड़ाएँ। अब बात यह आती है कि नशे से पीछा कैसे छुड़ाएँ। जैसे जहर जहर को मारता है, उसी तरह आपको दूसरे नशे की आदत डालना पड़ेगी। वह नशा होगा काम का। यकीन मानिए, जिस दिन यह नशा दूसरे नशों की तरह आपके सिर चढ़कर बोलने लगेगा, उसके बाद आप अपनी जिंदगी में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखेंगे, क्योंकि इस नशे की वजह से आपके किए-धरे का नाश नहीं होता, बल्कि यह आपकी शान ही बढ़ाता है।

और अंत में, आज अंतरराष्ट्रीय नशा निरोधन दिवस है। आज आप अपने किसी ऐसे परिचित को चुनें, जिसके सिर से आपको नशे का भूत उतारना हो। हाँ, यहाँ भूत उतारने के सामान्य तरीके मत अपनाने लगना, वर्ना बात बनने की बजाय बिगड़ जाएगी।

आप समय-समय पर उसे समझाएँ, नशा न करने के फायदे बताएँ। जिस दिन वह अपनी लत छोड़ देगा, वह आपके लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी और आपको उसके परिवार की दुआएँ भी मिलेंगी। अरे भई, पड़ी न लात। कितनी बार कहा था कि अपनी लत छोड़ दो।